एससी-एसटी आरक्षण: मायावती बोलीं- क्रीमी लेयर की बात करना अनुचित
संविधान के पवित्र उद्देश्यों के खिलाफ बताया
Photo: @Mayawati X account
लखनऊ/दक्षिण भारत। बसपा प्रमुख मायावती ने रविवार को कहा कि देश में 'बहुजन समाज’ में से ख़ासकर एससी, एसटी व ओबीसी वर्गों के लिए आरक्षण 'सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति’ अर्थात् हमेशा से इनके आत्म-सम्मान की ज़िंदगी से जुड़ा अति-महत्त्वपूर्ण व अत्यंत संवेदनशील मामला है।
उन्होंने कहा कि जाति के आधार पर सदियों से यहां तोड़े, सताए व पछाड़े गए एससी व एसटी समाज के लिए तो यह अत्यंत ज़रूरी मामला भी विशेषकर तब बन जाता है, जब जातिवादी द्वेष, शोषण, प्रताड़ना, अन्याय-अत्याचार कम होने का नाम न लें, और इसीलिए इसमें क्रीमी लेयर की बात करना अनुचित ही नहीं, बल्कि डॉ. भीमराव अंबेडकर के मानवतावादी संविधान के पवित्र उद्देश्यों के भी विरुद्ध है।मायावती ने कहा कि हालांकि किसी को भी इसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए, बल्कि सभी को देश व जनहित के मद्देनज़र अपनी पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ इस पर अमल भी ज़रूर करना चाहिए।
मायावती ने कहा कि इस बारे में आरएसएस प्रमुख का अभी हाल में फिर से यह कहना कि 'आरक्षण का जानबूझकर राजनीतिकरण किया गया है जिससे समाज में कड़वाहट भरी है तथा आरक्षण के लाभार्थियों को स्वेच्छा से इसका लाभ छोड़ देना चाहिए', वास्तव में यह इनकी ऐसी जातिवादी सोच है, जिससे संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति तो हो सकती है।
उन्होंने कहा कि इससे संवैधानिक उद्देश्यों की अवहेलना होती है, क्योंकि आरक्षण मूलतः सदियों से जातिवादी व्यवस्था के शिकार करोड़ों शोषित-पीड़ित, उपेक्षित व तिरस्कृत लोगों को मानवीय आधार पर समता व समानता का संवैधानिक व कानूनी अधिकार देना है, और जिसे आर्थिक उन्नति से कतई भी नहीं आँका जा सकता है, क्योंकि जातिवाद का दंश जीवन के हर पहलू में उन्हें डसता ही रहता है और जो क्रम अभी भी हर स्तर पर लगातार जारी है, यह आरएसएस से ज़्यादा भला कौन जानता है?
मायावती ने कहा कि इतना ही नहीं, बल्कि केंद्र में अभी तक रहीं सभी सरकारें भी इस कड़वी ज़मीनी वास्तविकता को भलीभांति जानती और समझती भी हैं और इसीलिए अगर वर्तमान सरकार अपने वाजिब तर्कों के आधार पर इसकी प्रभावी व समुचित पैरवी करके एससी व एसटी समाज को क्रीमी लेयर से दूर रखने के लिए अपना पक्ष अदालत से मनवा लेती है तो यह पूर्णतः उचित व संवैधानिक होगा।
मायावती ने कहा कि वैसे अक्सर यही देखा गया है कि सरकारों के लचर रवैए व अच्छी कानूनी पैरवी के अभाव में ही अदालतें 'सामाजिक परिवर्तन’ आदि के मामलों में सही से न्याय नहीं कर पाती हैं।
मायावती ने कहा कि इस बारे में आरएसएस से भी यही कहना है कि वह डॉ. भीमराव अंबेडकर के मानवतावादी एवं कल्याणकारी संविधान को पूरा-पूरा आदर-सम्मान देते हुए आरक्षण को लेकर राजनीति करना छोड़ दे और साथ ही आरक्षण में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ की वकालत बंद करके देश में 'समतामूलक समाज व्यवस्था’ की स्थापना के संवैधानिक दायित्व/उद्देश्यों की पूर्ति में पूरी तरह से सहयोग करे तो यह बेहतर होगा। यही वक्त की ज़रूरत व समय की मांग भी है।


