कब बदलेगा यह ढर्रा?

यह स्थिति सिर्फ कर्नाटक में नहीं है

कब बदलेगा यह ढर्रा?

आम नागरिक समस्याओं को अपने जीवन का हिस्सा मान चुका है

कर्नाटक के परिवहन मंत्री बाइरत्ती सुरेश ने अपनी पहचान छिपाकर बीएमटीसी की 10 से ज्यादा बसों में सफर किया तो कई खामियां उनके सामने आईं। एक आम नागरिक सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में रोजाना ही अनगिनत समस्याओं का सामना करता है। वह उन्हें अपने जीवन का हिस्सा मान चुका है। यह स्थिति सिर्फ कर्नाटक में नहीं है। हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में ऐसा ही हो रहा है। सार्वजनिक परिवहन हो या कोई भी सरकारी दफ्तर हो, वहां आम नागरिक समस्याओं से जूझता रहता है। इनका समाधान करने की फिक्र कम ही मंत्री करते हैं। यूं तो मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी जायजा लेने के लिए दौरे करते रहते हैं। इस तरह असल समस्याएं उनके सामने नहीं आती हैं। जैसे ही कर्मचारियों को पता चलता है कि मंत्री आ रहे हैं तो जगह की सफाई हो जाती है, साजो-सामान सलीके से रख दिया जाता है, जनता से विनम्रतापूर्वक बर्ताव शुरू हो जाता है। जब मंत्री चले जाते हैं तो वही पुराना ढर्रा लौट आता है। क्या यह स्थिति नहीं बदलनी चाहिए? स्वच्छता का पालन उस दिन ही क्यों हो? ऐसा हर दिन होना चाहिए। इसी तरह दफ्तरों में हर चीज हमेशा सलीके से रखी हो, जनता से रोजाना ही अच्छा बर्ताव होना चाहिए। बाइरत्ती सुरेश ने खुद देखा कि एक ड्राइवर ने यात्रियों के लिए बस नहीं रोकी। सोचिए, इस कर्मचारी ने अब तक कितनी बार ऐसा किया होगा? अगर कोई युवक इस विश्वास के साथ नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाए कि बस से सही समय पर वहां पहुंच जाएगा तो उसके साथ क्या होगा? ऐसे ड्राइवरों को यात्रियों की परवाह नहीं होती है। एक कंडक्टर ने तो कमाल ही कर दिया। उसने मंत्री को बस से नीचे उतर जाने के लिए कहा, क्योंकि उनके पास छुट्टे पैसे नहीं थे! जब कर्मचारी इतना असंवेदनशील रवैया अपनाएंगे तो जनता का क्या होगा? वह किससे गुहार लगाएगी?

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ऐसे कर्मचारियों के रवैए में बदलाव लाना जरूरी है। सरकार इन्हें बताए कि आपको जो वेतन मिल रहा है, वह जनता की सेवा करने के लिए मिल रहा है। सरकारी नौकरी का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि अपनी मर्जी चलाएंगे। बाइरत्ती सुरेश ने जो काम किया, वह इस देश के हर मंत्री को करना चाहिए। देश के पुलिस थानों में आम नागरिक के साथ कैसा बर्ताव किया जाता है? सरकारी अस्पतालों में अच्छा इलाज मिलना कितना मुश्किल है? बैंक, डाकघर, बिजलीघर, नगर पालिका ... ऐसी कौनसी जगह है जहां लोगों के काम आसानी से हो रहे हैं? किस दफ्तर में आम नागरिक को यहां से वहां नहीं दौड़ाया जाता है? अगर मंत्री औचक निरीक्षण करें तो बहुत सुधार हो सकता है। दूर-दराज के इलाकों में कई सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां शिक्षकों के वेतन-भत्तों पर करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं, लेकिन नतीजे निराशाजनक मिल रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे बच्चों के वीडियो वायरल हो चुके हैं, जो पांचवीं या इससे बड़ी कक्षा में पढ़ते हैं और उन्हें दस तक पहाड़े नहीं आते हैं। यही नहीं, इन कक्षाओं के कई बच्चे किताब तक नहीं पढ़ पाते हैं। उन्हें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री के नाम मालूम नहीं हैं। अगर वहां के शिक्षा मंत्री हफ्ते में दो दिन स्कूलों के औचक निरीक्षण पर निकल जाएं, बच्चों से ऐसे सवाल पूछें तो एक ही साल में हालात बदल सकते हैं। यूं तो सभी जगहों पर सुधार की जरूरत है, लेकिन पुलिस थानों में विशेष सुधार होना चाहिए। आज भी आम नागरिक वहां जाने से डरता है। अगर रात को सुनसान सड़क पर पुलिस मिल जाए तो शरीफ आदमी के मन में कई आशंकाएं पैदा होने लगती हैं। हाल के वर्षों में ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जब कुछ पुलिसकर्मियों ने अपने पद एवं शक्तियों का दुरुपयोग कर लोगों को सताया। ऐसे कर्मचारी सरकारी नौकरी में रहने के योग्य नहीं हैं। उन्हें तुरंत प्रभाव से बर्खास्त कर देना चाहिए।

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