हेराफेरी का खोट, विश्वास पर चोट
लोग यह सोचकर अपनी कमाई डाकघर को सौंपते हैं कि वह सुरक्षित रहेगी
मैसूरु में 44 ग्राहकों के बचत खातों में बड़ी हेराफेरी हो गई
दो दशक पहले आम लोगों में यह विश्वास बहुत मजबूत था कि 'अगर अपनी धनराशि को सुरक्षित रखना है तो उसे बैंक में जमा कराएं। अगर उसे ज्यादा सुरक्षित रखना है तो डाकघर से बेहतर कोई और जगह नहीं हो सकती।' इस अवधि में साइबर अपराधियों और कुछ भ्रष्ट कर्मचारियों ने बैंकों पर लोगों के विश्वास को बड़ी चोट पहुंचाई है। अब डाकघर के कुछ भ्रष्ट कर्मचारी उनसे चार हाथ आगे निकलने को आमादा हैं। मैसूरु में 44 ग्राहकों के बचत खातों से लगभग 1.3 करोड़ रुपए की हेराफेरी का मामला जनता के साथ बहुत बड़ा धोखा है। सारागुर में तैनात एक डाक सहायक और डाकिए ने ही इतनी बड़ी राशि उड़ा दी! दोनों पर आरोप है कि इन्होंने साल 2022 से 2025 के बीच सुनियोजित तरीके से लोगों के डाकघर बचत खातों से धनराशि निकाली और अपने तथा रिश्तेदारों के बैंक खातों में जमा करा दी। यह कितना बड़ा विश्वासघात है! लोग यह सोचकर अपनी मेहनत की कमाई डाकघर को सौंपते हैं कि वह सुरक्षित रहेगी और ब्याज दर के अनुसार उसमें बढ़ोतरी होगी। उक्त दोनों कर्मचारियों ने धनराशि पर ही नहीं, बल्कि जनता के विश्वास पर डाका डाल दिया। मामला सीबीआई तक पहुंचा तो ये पकड़े गए। इन्होंने लॉगिन संबंधी जानकारी का दुरुपयोग कर बचत खातों में सेंध लगाई थी। क्या इन्हें इतना भी नहीं पता था कि अब ऐसे मामलों का खुलासा बहुत जल्दी हो सकता है? सीबीआई जैसी एजेंसी के लिए यह कोई मुश्किल काम नहीं है। उसने हर ऑनलाइन लेनदेन का रिकॉर्ड देखा होगा। किस यूज़र आईडी से लॉगिन हुआ, किस समय हुआ, किस कंप्यूटर या मोबाइल फोन से हुआ, किस खाते में पैसा गया - जैसे सवालों पर गौर किया होगा। बैंकिंग में मनी ट्रेल बहुत बड़ा सबूत होता है।
आज कंप्यूटर, मोबाइल फोन, हार्ड डिस्क, लॉगिन हिस्ट्री, पासवर्ड, फाइलें और अन्य डिजिटल सबूतों के रूप में इतनी कड़ियां मौजूद हैं, जिन्हें जोड़कर आरोपियों तक पहुंचा जा सकता है। बैंक स्टेटमेंट और लेनदेन के क्रम का एआई विश्लेषण पूरी पोल खोल सकता है। किसी को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि वह बचत खातों में गड़बड़ कर देगा तो जांच एजेंसियां उस तक नहीं पहुंच सकेंगी। जो भ्रष्ट कर्मचारी खुद को बड़ा होशियार समझता है, वह ऐसे कृत्य के दौरान कई जगह सबूत छोड़ जाता है। हर सबूत को मिटाना उसके लिए संभव नहीं होता है। कौनसी चीज कहां सबूत बन सकती है, इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं है। जब मामला आगे जाता है तो कच्चा चिट्ठा खुलने में देर नहीं लगती है। जिन कर्मचारियों ने यह हेराफेरी की, उन्होंने पहले यही सोचा होगा कि 'हम करोड़ों रुपए आसानी से डकार जाएंगे ... खाता धारकों को तकनीक की ज्यादा जानकारी नहीं है ... जब तक किसी को पता चलेगा, हम करोड़ों में खेल चुके होंगे ... बात फाइलों में दब जाएगी ... जांच होकर किसी नतीजे तक पहुंचने में कई साल लग जाएंगे ... तब तक हम सारी धनराशि खा-पी जाएंगे!' आर्थिक अपराधों के साथ लालच जुड़ा होता है। जब इन्होंने साल 2022 में यह सिलसिला शुरू किया था, तब पकड़ में नहीं आए थे। इसके बाद इनका लालच बढ़ता गया। ये सवा करोड़ रुपए पर हाथ साफ करने के बावजूद नहीं रुके, क्योंकि लालच की कोई सीमा नहीं होती है। इन्होंने जो धनराशि उड़ाई, उसका उपभोग भी नहीं कर सकेंगे। उसे सरकार वसूल करेगी। इनकी गिरफ्तारी की वजह से सामाजिक प्रतिष्ठा गई। अब मुकदमा झेलेंगे। परिजन परेशान रहेंगे सो अलग। रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त मुंह मोड़ लेंगे। इन सबसे क्या मिला? इससे अच्छा यह था कि ईमानदारी से अपनी नौकरी करते और सम्मानजनक जीवन जीते। आज सरकारी नौकरी में वेतन बहुत अच्छा मिल रहा है। इसके बावजूद किसी कर्मचारी को भ्रष्टाचार की भूख है तो वह याद रखे- यह भूख सोना-चांदी के पहाड़ मिलने पर भी नहीं मिटेगी।

