कैसे सुधरेगी सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता?

बहुत अच्छा पढ़ाने वाले सरकारी शिक्षकों को सम्मानित करना चाहिए

कैसे सुधरेगी सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता?

ऐसे शिक्षक देश का भविष्य उज्ज्वल बनाते हैं

बिहार सरकार ने सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता सुधारने के लिए सरकारी शिक्षकों के कोचिंग और निजी ट्यूशन पढ़ाने पर रोक लगाने संबंधी जो फैसला लिया, वह सराहनीय है। अन्य राज्य सरकारों को भी ऐसा फैसला लेना चाहिए। सभी सरकारी शिक्षक कोचिंग और निजी ट्यूशन नहीं पढ़ाते, लेकिन कई शिक्षक ऐसा करते हैं। वे स्कूल में पूर्ण मनोयोग से अपना कर्तव्य नहीं निभाते हैं। जैसे ही स्कूल की छुट्टी होती है, वे अपनी दूसरी पारी की तैयारी में जुट जाते हैं। वहां दर्जनों बच्चे आते हैं और शिक्षक महोदय उनसे पूरा शुल्क वसूलते हैं। इस काम में गणित, विज्ञान और अंग्रेजी जैसे विषय, जो अन्य विषयों से थोड़े मुश्किल माने जाते हैं, के शिक्षकों की भागीदारी ज्यादा देखने को मिलती है। ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि जो शिक्षक कोचिंग और निजी ट्यूशन पढ़ाते हैं, वे स्कूल में पढ़ाने में जान-बूझकर सुस्ती दिखाते हैं। जिस पाठ को समझाने में ज्यादा मेहनत करनी होती है, वे उसमें पर्याप्त ऊर्जा नहीं लगाते। उनकी यह सोच होती है कि 'यहां ज्यादा मेहनत करने से कोई फायदा नहीं है, क्योंकि सरकार वेतन तो उतना ही देगी।' यह सोच हजारों विद्यार्थियों के साथ घोर अन्याय है। साथ ही, अपने कर्तव्य के प्रति उदासीनता है। जो शिक्षक अपनी पूरी ऊर्जा कोचिंग और निजी ट्यूशन में खर्च कर देगा, वह स्कूल में क्या पढ़ाएगा? उसे स्कूल में पढ़ाने के लिए प्रेरणा कहां से मिलेगी? वह तो इस सोच के साथ अपने दिन की शुरुआत करेगा कि कोचिंग और निजी ट्यूशन का प्रचार हो, वहां ज्यादा से ज्यादा बच्चे आएं, भरपूर कमाई हो, स्कूल में पढ़ाई चौपट होती है तो होती रहे। आज सरकारी शिक्षकों का वेतन बहुत अच्छा है। अब यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि 'सरकारी शिक्षकों की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर है, लिहाजा अतिरिक्त कमाई के लिए कोचिंग और निजी ट्यूशन की छूट दे देनी चाहिए, क्योंकि ये वहां भी मेहनत करते हैं और बच्चों का भविष्य संवारते हैं।'

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सरकारें स्कूलों की दशा सुधारने के लिए हर साल अरबों रुपए खर्च करती हैं। इसमें बड़ा खर्च सरकारी शिक्षकों के वेतन-भत्तों पर होता है। इसके बावजूद ये स्कूल वैसे नतीजे नहीं दे पा रहे हैं, जैसी इनसे उम्मीद की जाती है। बोर्ड परीक्षा के नतीजों में निजी स्कूलों का ही दबदबा रहता है, जबकि इन स्कूलों के शिक्षकों का वेतन सरकारी शिक्षकों के वेतन से काफी कम होता है। देश में ऐसे सरकारी स्कूलों की संख्या हजारों में है, जहां 20 से कम विद्यार्थी हैं। जबकि उनके आस-पास निजी स्कूलों में भीड़ उमड़ रही है। क्या इस मुद्दे पर बात नहीं करनी चाहिए? सरकारी स्कूलों के संचालन में कुछ गंभीर खामियां हैं, जिन्हें बड़े-बड़े अधिकारी और नेतागण दूर नहीं कर पा रहे हैं। वहां जवाबदेही की कमी स्पष्ट झलकती है। अगर देश के इतने संसाधन खर्च हो रहे हैं तो बेहतर नतीजे दिखने चाहिएं। इसके लिए जवाबदेही तय की जाए। सरकारी शिक्षकों के कोचिंग और निजी ट्यूशन पढ़ाने पर रोक लगाई जाए। जो शिक्षक इन गतिविधियों में लिप्त पाए जाएं, उन्हें चेतावनी दी जाए। अगर वे फिर भी न मानें तो नौकरी से बाहर कर दिए जाएं। पूरे देश में ऐसा नियम लागू किया जाए कि सरकारी शिक्षक अपने बच्चों को स्कूली शिक्षा सरकारी स्कूल से ही दिलाएंगे। इस नियम के दायरे में सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों को भी लाया जाए। जो सरकारी शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी और जनप्रतिनिधि ऐसा करने में आनाकानी करे, उसे पद से हटा दिया जाए। स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए सरकार को कुछ कड़े कदम उठाने होंगे। सिर्फ बजट बढ़ाने, बड़ी घोषणाएं कर देने से कुछ नहीं होगा। अगर भारत को विश्वगुरु बनाना है तो हमें अपने सरकारी स्कूलों को अमेरिका और चीन के सरकारी स्कूलों से बेहतर बनाना होगा। जो सरकारी शिक्षक बहुत अच्छा पढ़ाते हैं, खूब मेहनत करते हैं, उन्हें सम्मानित करना चाहिए। ऐसे शिक्षक देश का भविष्य उज्ज्वल बनाते हैं।

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