बागी नेताओं का एनसीपीआई में विलय हास्यास्पद: तृणकां
ममता बनर्जी के खेमे ने इस कदम को बेतुका बताया
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कोलकाता/दक्षिण भारत। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच जुबानी जंग तब और तेज़ हो गई जब तृणकां के बागी सांसदों ने 'नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया' यानी एनसीपीआई में विलय करने और राजग को समर्थन देने का ऐलान किया। ममता बनर्जी के खेमे ने इस कदम को बेतुका बताया, जबकि भाजपा ने इसे तृणकां के गहरे संकट का सबूत करार दिया।
वरिष्ठ तृणकां सांसद सौगत रॉय ने बागी नेताओं के 'नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया' में विलय करने के फैसले का मज़ाक उड़ाया। उन्होंने इस कदम की राजनीतिक अहमियत और मतदाताओं के सामने इसे सही ठहराने की बागियों की क्षमता, दोनों पर सवाल उठाए।रॉय ने कहा, 'जिस पार्टी के चुनाव चिह्न पर आप चुने गए, उसी पार्टी से धोखा करने के बाद आप अपने मतदाताओं का सामना कैसे करेंगे? यह विलय बेतुका है। एनसीपीआई को कौन जानता है? क्या वे अपने चुनाव क्षेत्रों में जाकर लोगों को बता सकते हैं कि वे अब एनसीपीआई का हिस्सा हैं? यह विलय उन गद्दारों की हताशा को दिखाता है जो अपने भाजपा आकाओं को खुश करना चाहते हैं।'
यह आरोप लगाते हुए कि इस कदम को भाजपा का परोक्ष समर्थन हासिल था, रॉय ने कहा कि बागी सांसदों ने एनसीपीआई का रास्ता इसलिए चुना क्योंकि संसदीय नियम किसी मौजूदा पार्टी के भीतर एक अलग गुट को मान्यता देने की इजाज़त नहीं देते हैं।
उन्होंने कहा, 'इसीलिए उन्होंने भाजपा के सीधे समर्थन से यह रास्ता अपनाया। यह बेतुका है। जनता का समर्थन ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणकां के साथ ही रहेगा, न कि गद्दारों के साथ।'
यह टिप्पणी तब आई जब तृणकां के बागी सांसदों ने एनसीपीआई के साथ विलय की घोषणा के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की और सदन में बैठने की अलग व्यवस्था की मांग की।
बागी गुट ने दावा किया कि 20 सांसदों — जो पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों की संख्या का दो-तिहाई से ज़्यादा है — ने इस कदम का समर्थन किया है और वे संसद में राजग का साथ देंगे।
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने लोकसभा अध्यक्ष के सामने बागी गुट के दावे को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि संविधान और दलबदल विरोधी कानून किसी राजनीतिक पार्टी के भीतर एक अलग गुट को मान्यता देने की इजाज़त नहीं देते हैं।


