कैसे लें इतिहास का 'प्रतिशोध'?

क्या 'प्रतिशोध' हिंसक तरीके से ही लिया जा सकता है?

कैसे लें इतिहास का 'प्रतिशोध'?

हमें किसी को मिटाने की नहीं, अपने देश को और महान बनाने की जरूरत है

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने 'विकसित भारत युवा नेतृत्व संवाद’ कार्यक्रम में इतिहास का 'प्रतिशोध' लेने और हर क्षेत्र में भारत को मजबूत बनाने संबंधी जो आह्वान किया, उसे देशवासियों, खासकर युवाओं को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए। हम आज जो हैं, जिस स्थिति में हैं, वह इतिहास का परिणाम है। हम भविष्य में क्या होंगे, किस स्थिति में होंगे, वह हमारे वर्तमान का परिणाम होगा। डोभाल के शब्दों पर जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती समेत कुछ कथित बुद्धिजीवियों द्वारा दी गई प्रतिक्रिया गलत सन्दर्भ को दर्शाती है। क्या 'प्रतिशोध' हिंसक तरीके से ही लिया जा सकता है? जो लोग ऐसा मानते हैं, उन्हें इतिहास को फिर से पढ़ने की जरूरत है। द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान पूरी तरह तबाह हो गया था। उसके हिरोशिमा और नागासाकी जैसे शहर खंडहर के ढेर बन गए थे। जापान ने उसका प्रतिशोध कैसे लिया? क्या उसने अमेरिका और उसके मित्र देशों को नष्ट करने की कोई प्रतिज्ञा की थी? नहीं, जापान ने ऐसा नहीं किया। वह देश खंडहर के ढेर से दोबारा उठ गया, अपनी शक्ति बटोरी और नए संकल्प के साथ चलने लगा, बल्कि दौड़ने लगा। जापान तकनीकी उत्कृष्टता और गुणवत्ता का दूसरा नाम बन गया। आज अमेरिका ही नहीं, हर देश जापान का लोहा मानता है। किस देश के लोग वहां नौकरी करने नहीं जाते? प्रतिशोध लेने का सभ्य तरीका यही है कि हम अपनी कमजोरियों को दूर कर खुद को हर तरह से इतना मजबूत बना लें कि जिन्होंने पहले कभी अत्याचार किए थे, वे दोबारा ऐसा करने का दुस्साहस न कर पाएं।

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डोभाल ने सत्य कहा कि 'हमारे गांव जले, हमारी सभ्यता को समाप्त किया गया, हमारे मंदिरों को लूटा गया और हम एक मूक दर्शक की तरह असहाय होकर देखते रहे।' इसका प्रतिशोध कैसे लिया जाए? जो आक्रांता यहां आए थे, वे तो सदियों पहले मर-खप गए! क्या उनके देशों पर धावा बोल देना चाहिए? उनमें से ज्यादातर देश ऐसे हैं, जिनके साथ भारत के अच्छे संबंध हैं। इसका प्रतिशोध लेने का सबसे सही तरीका यह है कि हमारे देश की बाह्य एवं आंतरिक सुरक्षा मजबूत की जाए। जो व्यक्ति, संगठन या विदेशी सरकार भारत और भारतवासियों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करे, उसे ऐसा सख्त जवाब दिया जाए कि इतिहास याद रखे। कुछ साल पहले एक अमेरिकी अखबार ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का मजाक उड़ाते हुए कार्टून छापा था। उसमें एक किसान अपनी गाय लेकर 'एलीट स्पेस क्लब' में दाखिल होने के लिए दरवाजा खटखटा रहा था। उसका प्रतिशोध लेने के लिए भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को और उन्नत बनाना चाहिए। भारत यह प्रतिशोध ले चुका है। अमेरिका और चीन जैसे देश भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और विशेषज्ञों की तारीफ करने को मजबूर हैं। बड़ा सवाल है- इतिहास से सबक लेकर भविष्य में बड़ा प्रतिशोध कैसे लिया जाए? इसके लिए कई मोर्चों पर तैयारी करनी होगी। विदेशी आक्रांताओं ने हमारी आपसी फूट का बहुत फायदा उठाया था। हमें इसका प्रतिशोध राष्ट्रीय एकता को और मजबूत करते हुए लेना चाहिए। हमारे संसाधनों को बहुत लूटा गया था। अब हमें ज्ञान, विज्ञान और तकनीक की राह पर तेजी से आगे बढ़ते हुए सबसे शक्तिशाली और समृद्ध देश का निर्माण करना चाहिए। हमें किसी को मिटाने की नहीं, अपने देश को और महान बनाने की जरूरत है।

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