जंक फूड का जाल
कई लोग पश्चिमी देशों की हर चीज को महान समझ लेते हैं
बच्चों को स्वास्थ्य की रक्षा के लिए खानपान संबंधी अच्छी आदतें सिखाएं
ब्रिटेन ने बच्चों की सेहत को ध्यान में रखते हुए जंक फूड के संबंध में जो सख्ती दिखाई है, उससे अन्य देशों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए। भारत में जंक फूड का चलन तेजी से बढ़ रहा है। इसे जीवन स्तर से जोड़कर देखा जाने लगा है। टीवी और सोशल मीडिया पर प्रसारित विज्ञापनों ने परिवारों की सोच को इस कदर बदल दिया है कि जंक फूड को आधुनिक जीवन की अनिवार्यता समझा जाने लगा है। कुछ लोग इसके पैकेट पर लिखी मात्रा को पढ़कर सोचते हैं कि इससे हमें पर्याप्त पोषण मिल जाएगा, जबकि यह धारणा सही नहीं है। कई लोग पश्चिमी देशों की हर चीज को महान समझ लेते हैं। वे पश्चिमी नाम, खानपान, रहन-सहन, पहनावे आदि को अपनाने में बड़प्पन महसूस करते हैं। बात जब खानपान की हो तो याद रखना चाहिए कि हमारे देश की भौगोलिक स्थिति, मौसम, फसल चक्र, जलवायु बिल्कुल अलग हैं। अगर हम प्रकृति के नियमों का उल्लंघन कर पश्चिमी देशों का खानपान अपनाएंगे तो रोगी होंगे। नब्बे के दशक में टीवी पर ऐसे विज्ञापनों की भरमार शुरू हुई थी, जिनमें बच्चों को बताया जाता था कि स्कूल जाने से पहले यह चीज खाएंगे तो आपका दिमाग तेज चलेगा, यह चीज पीएंगे तो शरीर में बिजली दौड़ेगी। बच्चों की एक किताब में 'विकास' का बड़ा विचित्र वर्णन किया गया था। एक लेखक राजस्थान के गांव में बतौर मेहमान जाता है तो उसे नाश्ते में ब्रेड परोसी जाती है! यह देखकर लेखक कहता है कि अब राजस्थान के गांव पिछड़े नहीं रहे, ये विकास करने लगे हैं!
अगर नाश्ते में ब्रेड की जगह बाजरे की रोटी, चटनी और छाछ परोसी जाती तो इन्हें पिछड़ेपन से जोड़कर देखा जाता। यह कितना हास्यास्पद है! ब्रेड खाना या बाजरे की रोटी खाना किसी व्यक्ति की पसंद पर निर्भर करता है, लेकिन हमारे देश के भोजन को पिछड़ेपन से जोड़कर देखना उचित नहीं है। अब तो वैज्ञानिक भी स्वीकार करने लगे हैं कि बाजरा स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। भारत सरकार श्री अन्न का प्रचार कर रही है। हमारे देश को खानपान के मामले में स्वर्ग कहा जाए तो गलत नहीं होगा। यहां हजारों प्रकार के पकवान हैं। चटनी, अचार, शर्बत और अन्य पेय पदार्थों की तो गिनती ही नहीं है। हर मौसम के लिए अलग चीजें हैं। उनके पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण हैं। कौनसा पदार्थ किस मौसम में खाने से फायदा देगा और कब नुकसान करेगा, इसका वर्णन आयुर्वेद में मिलता है। क्या जंक फूड के समर्थन में कोई ऐसा प्रमाण है? अब डॉक्टर इससे दूर रहने के लिए कह रहे हैं। फिर भी ब्याह-शादियों से लेकर सामान्य दिनों में भी लोग जंक फूड खाने के लिए उमड़ते हैं। उसे पचाने के लिए ऊपर से खास किस्म के शीतल पेय पीते हैं। कई बच्चों को इनकी लत लग चुकी है। वे दाल, सब्जी, रोटी और सलाद से दूर भागते हैं। दूध, दही, पनीर, छाछ देखकर उनकी भूख गायब हो जाती है। हां, वे जंक फूड खाने के लिए आधी रात को उठने को तैयार हैं। बच्चों को ऐसे विज्ञापन बहुत आकर्षित करते हैं, जिनमें बताया जाता है कि एक चीज कुछ ही मिनटों में बनकर तैयार हो जाएगी। सवाल है- समय की इतनी बचत करने के बाद क्या करेंगे? मोबाइल फोन चलाएंगे? बच्चों को स्वास्थ्य की रक्षा के लिए खानपान संबंधी अच्छी आदतें सिखाएं। जंक फूड से जितना दूर रहें, उतना बेहतर है। अपने देश का शुद्ध और सात्विक खानपान सर्वश्रेष्ठ है।

