मुफ्त प्रचार के लिए आस्था पर प्रहार क्यों?

आपत्तिजनक सामग्री तेजी से फैलती है

मुफ्त प्रचार के लिए आस्था पर प्रहार क्यों?

इनका संपूर्ण बहिष्कार ही उचित जवाब है

एक मशहूर आभूषण कंपनी ने रक्षाबंधन के विज्ञापन में परिधान संबंधी जो प्रयोग किया, उससे उसकी मंशा का पता चलता है। ऐसे सारे प्रयोग हिंदू त्योहारों और मान्यताओं के साथ जोड़कर ही क्यों किए जाते हैं? क्या कोई 'क्रांतिवीर' अपनी ऐसी कलाकारी अन्य जगहों पर दिखाने की हिम्मत कर सकता है? कुछ लोग, जिन्हें न्यूटन का कोई नियम तक याद नहीं है, जैसे ही हिंदू त्योहार आते हैं, वे उनका इस तरह वैज्ञानिक विश्लेषण करने लगते हैं, जैसे विज्ञान का इनसे बड़ा ज्ञाता कोई दूसरा नहीं हुआ है। उन्हें शिकायत रहती है कि दीपावली पर दीप जलाएंगे तो प्रदूषण होगा! होली पर रंग लगाएंगे तो पानी की खपत बढ़ जाएगी! इनकी मानें तो करवा चौथ का व्रत करना अंधविश्वास है! ये तुलसी पूजन पर भी सवाल उठाते हैं। इनकी वैज्ञानिक विश्लेषण क्षमता एक दायरे तक ही सीमित रहती है, क्योंकि ये जानते हैं कि इससे आगे गए तो मामला बिगड़ने के पूरे योग बनेंगे। जिस अभिनेत्री ने उक्त आभूषण कंपनी के विज्ञापन में खास तरह की पोशाक पहनी, उसे निजी स्वतंत्रता से जोड़कर प्रचारित किया जा रहा है। वास्तव में मामला ऐसा नहीं है। हमारे देश में रक्षाबंधन पवित्र भावना के साथ मनाया जाने वाला त्योहार है। इसके साथ ऐतिहासिक परंपराएं और मर्यादाएं जुड़ी हुई हैं। अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक मंच पर इससे संबंधित सामग्री का प्रचार-प्रसार करे तो उसे इन बातों का ध्यान रखना चाहिए। यह कोई उपदेश नहीं है, बल्कि सामान्य बात है। इतनी समझ हर व्यक्ति में होनी चाहिए। विज्ञापन पर विवाद छिड़ने के बाद एक मशहूर राजनीतिक पार्टी के वरिष्ठ नेता का यह कहना इस विषय के बारे में उनके अल्प ज्ञान को दर्शाता है कि 'महिलाएं क्या पहनती हैं, क्या करती हैं और कहां जाती हैं, यह उनकी पसंद है। महिलाओं को अपनी स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने के लिए ट्रोल करना बंद करें।'

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यह मुद्दा महिलाओं की पसंद पर प्रतिबंध लगाने और उन्हें कहीं जाने से रोकने का है ही नहीं। जिस तरह कोई व्यक्ति मंदिर में दर्शन करने जाता है तो वहां उसे कुछ नियमों का पालन करना होता है, उसी तरह रक्षाबंधन पर राखी बांधने या बंधवाने के भी कुछ नियम होते हैं, जो इसकी पवित्रता और मर्यादा को सुनिश्चित करने के लिए जरूरी हैं। हर जगह के अपने नियम होते हैं। उनका पालन करने से व्यवस्था बनी रहती है। अगर कोई व्यक्ति सुबह एक महान नेता के समाधि स्थल पर फूल चढ़ाने जाए और शाम को किसी पार्टी में नृत्य प्रतियोगिता में भाग ले तो उसे दोनों जगह के माहौल के अनुसार अपना व्यवहार रखना पड़ेगा। वहां यह तर्क काम नहीं करेगा कि 'मेरी ज़िंदगी, मेरी मर्जी।' विज्ञापन मामले में विवाद के बाद कंपनी ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। प्राय: हर कंपनी बाद में ऐसा ही करती है और कई वजह गिनाकर दावा करती है कि 'ऐसा अनजाने में हुआ, हमारी मंशा गलत नहीं थी।' क्या ये कंपनियां भारतीय समाज, संस्कृति, त्योहारों और मान्यताओं से इतनी अनजान हैं? कोई भी विज्ञापन, खासकर त्योहारों से पहले यूं ही नहीं बन जाता है। इसके लिए कंपनी के कई वरिष्ठ अधिकारी बातचीत करते हैं। कई लोगों से राय ली जाती है। विज्ञापन में किस बात पर जोर देना चाहिए, यह तय किया जाता है। उसके बाद स्क्रिप्ट लिखी जाती है। उसमें भी बहुत काट-छांट होती है। वह विज्ञापन जनता तक पहुंचते-पहुंचते दर्जनों आंखों के सामने से गुजरता है। क्या कंपनी का एक भी अधिकारी यह कमी नहीं पकड़ पाया? वास्तव में ऐसे विज्ञापनों के पीछे एक रणनीति होती है। उन्हें जानबूझकर ऐसा बनाया जाता है, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग देखें। चूंकि आपत्तिजनक सामग्री तेजी से फैलती है, उसकी खूब चर्चा होती है, इसलिए कंपनी को करोड़ों रुपए का प्रचार मुफ्त में मिल जाता है। अगर मामला ज्यादा तूल पकड़ लेता है तो गोलमोल जवाब दे दिया जाता है। ऐसी कंपनियां और कथित फिल्मी सितारे जो हिंदू आस्था का मजाक उड़ाते हैं, उनका संपूर्ण बहिष्कार ही उचित जवाब है।

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