ज़रदारी का 'प्रतिशत' प्रेम
पाकिस्तान में कट्टरता, मूर्खता और आतंकवाद में भयंकर बढ़ोतरी हुई है
'मिस्टर टेन परसेंट' के नाम से प्रसिद्ध हैं ज़रदारी
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी द्वारा अपने देश की हिंदू आबादी के बारे में दिया गया बयान शर्मनाक और निंदनीय है। राष्ट्रपति पद की एक प्रतिष्ठा होती है, जिसे ज़रदारी ने यह कहकर धूमिल कर दिया कि वे अल्पसंख्यक हिंदू आबादी को बर्दाश्त कर रहे हैं। आज पाकिस्तान में हिंदू कुल आबादी का लगभग 2 प्रतिशत हैं। पाकिस्तानी राष्ट्रपति को इन्हें बर्दाश्त करना पड़ रहा है। इस पड़ोसी देश में कट्टरता, मूर्खता और आतंकवाद में भयंकर बढ़ोतरी हुई है। अल्पसंख्यक अपनी जान बचाने के लिए अन्य देशों में शरण मांगने को मजबूर हैं। ज़रदारी इतने 'तेजस्वी' मनुष्य हैं कि उन्हें अपने मुल्क के हालात दिखाई नहीं देते हैं। इनके कारनामों की सूची बहुत लंबी हैं। किसी संख्या का प्रतिशत निकालना इन्हें कुछ ज्यादा ही पसंद है। ये राष्ट्रपति बनने से पहले 'मिस्टर टेन परसेंट' के नाम से प्रसिद्धि पा चुके हैं। जब इनकी पत्नी बेनज़ीर भुट्टो प्रधानमंत्री थीं तो ये सरकारी ठेकों और परियोजनाओं की फाइलें खुद देखते थे। इनका हिसाब बहुत सीधा था। जो व्यक्ति 10 प्रतिशत कमीशन देता, ठेका उसी को मिलता था। इन्होंने यही फॉर्मूला लगाकर बैंक लोन दिलाने में भी खूब दौलत बटोरी थी। बेनज़ीर की हत्या होने के बाद, इनकी रंगीन-मिजाजी के किस्से अमेरिका तक मशहूर हुए थे। ये बतौर राष्ट्रपति अमेरिका गए थे, जहां एक महिला नेता के बारे में की गई इनकी टिप्पणी ने पाकिस्तान की खूब किरकिरी कराई थी। कहा तो यह जाता है कि ज़रदारी ने उस महिला के लिए ओछी शेरो-शायरी की थी, जिसका पता चलने पर पाकिस्तानी महिलाओं ने इनके विरोध में खूब जुलूस निकाले थे। ऐसा व्यक्ति किसी देश का राष्ट्रपति कैसे बन सकता है?
ज़रदारी का एक कारनामा तो ऐसा है, जिसके आगे हॉलीवुड फिल्में भी फेल हैं। ये जनाब नब्बे के दशक में कई कारोबारियों से हर महीने मोटी रकम वसूलते थे। मुर्तज़ा बुखारी नामक एक कारोबारी रुपए देने में आनाकानी कर रहा था। उसे ज़रदारी ने धमकाया, ब्लैकमेल किया था। वह फिर भी नहीं माना। आखिर में मुर्तज़ा बुखारी के पैर पर बम बांध दिया और उसे बैंक से रुपए निकाल कर लाने के लिए कहा। साथ ही, धमकी दी कि रुपए नहीं लाने की सूरत में रिमोट का बटन दबाकर धमाका कर दूंगा। उस मामले में ज़रदारी को जेल जाना पड़ा था। ऐसा कोई एक मामला नहीं है। ज़रदारी ने पूरे पाकिस्तान में सैकड़ों लोगों को इसी तरह डरा-धमका कर अपनी तिजोरियां भरी थीं। अब ये दोबारा राष्ट्रपति के पद को 'सुशोभित' कर रहे हैं। असल में, पाकिस्तान के लोग इन्हें बर्दाश्त कर रहे हैं। यूं तो इन्हें पढ़ने-लिखने का शौक कभी नहीं रहा, लेकिन 'भारतीय नज़रिया और अखंड भारत' के बारे में इनकी टिप्पणी सुनकर कई पाकिस्तानियों को इनके विद्वान होने का भ्रम हो सकता है। इनकी यह टिप्पणी समझ से परे है कि 'पाकिस्तान में 4 प्रतिशत हिंदू आबादी है। वे यहां उतने ही आज़ाद हैं, जितने कहीं और। वे भारत के बजाय हमारे साथ रहना ज़्यादा पसंद करेंगे।' ऐसा प्रतीत होता है कि ज़रदारी ने पिछले 40 वर्षों से कोई अख़बार नहीं पढ़ा। अगर पढ़ा होता तो बेसिर-पैर की बातें न करते। पाकिस्तानी हिंदू तो लगातार अपने मकान, दुकान, खेत और खलिहान छोड़कर भारत आ रहे हैं। उन्हें कई कानूनी प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता है। नागरिकता मिलने में भी काफी समय लगता है। अगर इतने नियम न होते तो आज कोई हिंदू पाकिस्तान में नहीं रहता। वहां का बहुसंख्यक वर्ग भी किसी-न-किसी तरह पाकिस्तान से निकल भागना चाहता है। जहां ज़रदारी जैसे राष्ट्रपति होंगे, वहां ऐसे ही करिश्मे होंगे।

