संयम और सूझबूझ से नियंत्रित करें कीमतें
अफवाहों पर विश्वास न करें
बाजार में नई आवक होने पर कीमतें वैसे ही नीचे आ जाती हैं
देश के कई इलाकों में चीनी की कीमत बढ़ने के बाद कुछ यूट्यूबर और कथित बुद्धिजीवी जनता को भड़काने का काम कर रहे हैं। बेशक चीनी की कीमत कम होनी चाहिए। कई त्योहार आने वाले हैं, इसलिए चीनी की उपलब्धता हर इलाके में सुनिश्चित की जानी चाहिए। केंद्र सरकार इसके लिए जरूरी कदम उठा रही है। नागरिकों का भी कर्तव्य है कि वे अफवाहों पर विश्वास न करें। कुछ सोशल मीडिया चैनल हर मुद्दे को 'तिल का ताड़' बनाकर पेश करते हैं। उनकी बातों पर विश्वास कर मार्च-अप्रैल में कई लोगों ने गैस एजेंसियों के सामने भारी हुड़दंग मचाया था। उन चैनलों ने पश्चिम एशिया के हालात को इस तरह दिखाया था, जैसे एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति समाप्त हो जाएगी, दुनिया हजारों साल पुराने युग में चली जाएगी और लोगों को पत्थरों से आग जलानी पड़ेगी! उस दौरान बड़ी संख्या में लोग यह कहते हुए सिलेंडर लेने चले गए थे कि 'आज ही खाली हुआ है!' क्या ऐसा संभव है कि एक दिन पहले सभी घरों में रसोई गैस की सामान्य खपत हो और अगले ही दिन सबके सिलेंडर खाली हो जाएं? दरअसल, कुछ सिलेंडर खाली हुए थे, लेकिन बहुत लोग घबराहट में बुकिंग कर रहे थे। इसलिए कई ग्राहकों को खाली हाथ लौटना पड़ा था। इससे देशभर में यह संदेश गया कि सच में ही एलपीजी सिलेंडरों की किल्लत हो गई है। उस समय प्रशासन ने छापे मारकर ऐसे लोगों को बेनकाब किया था, जो अपने घरों में आधा दर्जन से लेकर दो-तीन दर्जन तक सिलेंडर दबाए बैठे थे। ऐसी मानसिकता के लोग दोबारा सक्रिय हो गए हैं। वे चाहते हैं कि जनता में घबराहट फैले, वह ज्यादा कीमत पर चीनी खरीदे। जबकि वे ठहाके लगाएं और खूब मुनाफा कमाएं।
जब लोगों के पास सोशल मीडिया के जरिए ऐसी पोस्ट पहुंचती हैं- 'चीनी की कीमतों में लगी आग', 'चीनी के लिए मचा हाहाकार', 'कड़वी हो गई चीनी की मिठास', तो उनके मन में यह ख़याल आना स्वाभाविक है कि 'हम अभी बाजार जाएं और अपने लिए चीनी खरीद लाएं।' वे अपनी जरूरत से ज्यादा चीनी ले आते हैं। इससे दूसरों को पर्याप्त चीनी नहीं मिलती है। कुछ साल पहले सोशल मीडिया पर अफवाह फैली थी कि देश में नमक की भारी किल्लत हो गई है। उस समय कई लोगों ने दस-दस किलो नमक खरीद लिया था। कुछ तो इतने 'होशियार' निकले कि वे ऊंचे दामों पर बोरी भरकर नमक ले आए थे। जब हकीकत सामने आई तो माथा पकड़ लिया! जिम्मेदार और अनुशासित नागरिक ऐसे समय में अपनी जरूरत से ज्यादा चीज नहीं खरीदते हैं। इससे कीमतें सामान्य स्तर पर बनी रहती हैं। हर साल सब्जी मंडी में कुछ अवधि के लिए एक-दो चीजों की कीमतों में काफी बढ़ोतरी हो जाती है। जब प्याज बहुत महंगा हो जाता है तो हर कोई प्याज ही खरीदना चाहता है। जब टमाटर बहुत महंगा हो जाता है तो हर कोई टमाटर खरीदने के लिए लाइन में लग जाता है। इससे कीमतों में बढ़ोतरी जारी रहती है। अगर लोग थोड़ी-सी सूझबूझ दिखाएं और सिर्फ एक हफ्ते तक धैर्य रखें तो कीमतें सामान्य स्तर पर आ सकती हैं। बाजार में नई आवक होने पर कीमतें वैसे ही नीचे आ जाती हैं। जब चीजें काफी सस्ती होती हैं तो उन्हें खरीदार नहीं मिलते हैं। अक्टूबर 2015 में दालों की कीमतों में बढ़ोतरी हो गई थी। कई दुकानों पर दाल खरीदने के लिए भीड़ लग गई थी। विभिन्न 'बुद्धिजीवियों' ने सोशल मीडिया पर यह कहते हुए केंद्र सरकार को कोसना शुरू कर दिया था कि 'दाल का अकाल' पड़ गया है। उसके बाद, जैसे ही नई आवक हुई, भीड़ छंट गई। अगर अभी लोग चीनी का सामान्य मात्रा में उपयोग करें, जरूरत से ज्यादा खरीदारी न करें तो कुछ ही दिनों में कीमत पुराने स्तर पर लौट सकती है।

