युवाओं में बढ़ती उद्देश्यहीनता
इससे कई सामाजिक समस्याओं का जन्म होता है
परिवार, समाज और सरकार - तीनों को प्रयास करने होंगे
नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट का यह निष्कर्ष युवाओं में बढ़ती उद्देश्यहीनता को जाहिर करता है कि 'देश में 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 8.7 करोड़ युवा ऐसे हैं, जो न तो पढ़ाई कर रहे हैं, न रोजगार में हैं और न ही किसी तरह का प्रशिक्षण ले रहे हैं।' जब जीवन में न कोई दिशा होती है और न कोई प्रेरणा होती है तो यही स्थिति पैदा होती है। इससे कई सामाजिक समस्याओं का जन्म होता है, लिहाजा सरकारों को इस ओर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। देश में कई युवा ऐसे हैं, जो कोई कामकाज नहीं करते, सिर्फ मोबाइल फोन के साथ व्यस्त रहते हैं। जब परिजन उन्हें कोई अच्छी राय देते हैं तो वे झगड़ा करने को दौड़ते हैं। ऐसी स्थिति एक दिन में पैदा नहीं होती है। प्राय: ऐसे लोगों के जीवन के सामने किशोरावस्था से ही कोई लक्ष्य नहीं होता है। हमारी शिक्षा पद्धति भी उनकी प्रतिभा को पहचानने में ज्यादा कारगर नहीं है। ईश्वर हर इन्सान को विशेष गुणों के साथ धरती पर भेजता है, लेकिन यहां की व्यवस्था इतनी दोषपूर्ण है कि बहुत कम ही उनका सदुपयोग कर पाते हैं। कुछ लोगों को मलाल रहता है कि वे बचपन में बहुत अच्छी चित्रकारी करते थे, बाद में ऐसे फेर में फंसे कि सबकुछ भूल गए। कई जगह सामाजिक वातावरण ऐसा है कि अच्छे-भले युवा उद्देश्यहीनता के शिकार हो जाते हैं। उन्हें प्रेरणा देने वाला कोई नहीं होता है। वे झुंड बनाकर घूमते हैं, थोथी बातें करते हैं और यूं ही पूरा दिन गुजार देते हैं। कई युवा तो नशा करने लगते हैं। उन्हें अपने जीवन में एक 'चमत्कार' का इंतजार रहता है। अगर उन्हें कोई मेहनत का काम करने के लिए कहता है तो फौरन पीछे हट जाते हैं। वे पसीना बहाने से कोसों दूर रहते हैं।
अब सवाल है- इन युवाओं का क्या किया जाए? सबसे पहले तो इन्हें कुसंगति से दूर करना चाहिए। अगर कुसंगति नहीं है तो बहुत अच्छी बात है। उस सूरत में इनकी बेहतरी की उम्मीद ज्यादा रहेगी। ऐसे युवाओं को स्थानीय बाजार मांग को ध्यान में रखते हुए कोई कामकाज सीखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। अगर कोई युवा अपना व्यवसाय शुरू करता है तो स्थानीय लोगों को उसकी बिक्री बढ़ाने में कुछ योगदान देना चाहिए। मेहनती युवाओं को आगे बढ़ाने के लिए समाज को अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभानी होगी। कई युवा अपना व्यवसाय शुरू करते हैं, लेकिन सबकुछ उधारी में गंवा देते हैं। राजस्थान का एक युवा अपने घर से लगभग 200 किमी दूर फूड स्टॉल लगाता है, क्योंकि इससे पहले अपने शहर में यही काम कर उधारी में धंधा डुबो चुका है। अनजान जगह पर काम करने से उधारी का खटका कम रहता है। कई लोगों में एक विचित्र आदत होती है। उन्हें हर चीज बिल्कुल मुफ्त चाहिए। एक युवा अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद शहर से गांव आया। वहां दो-तीन बच्चे उससे पढ़ाई में मार्गदर्शन लेने के लिए आने लगे। धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ने लगी। लोग जब-तब अपने बच्चों को यह कहकर भेजने लगे कि 'सवाल समझ में नहीं आ रहा है तो उन भैया से पूछ लो।' कोई बच्चा गणित की किताब लेकर आता, तो कोई विज्ञान, अंग्रेजी और भूगोल की पोथियां लेकर सवालों की बौछार कर देता। कोई 'प्रिय शिक्षक' पर निबंध लिखवाने आ जाता, तो कोई चार पन्नों का भाषण लिखकर देने की मांग करता। एक दिन उस युवक ने पढ़ाने के लिए मामूली-सा शुल्क लेने की घोषणा की तो सारी भीड़ छंट गई। कई लोग अपने बच्चों की शादियों पर लाखों रुपए खर्च कर देते हैं, ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज तक उठा लेते हैं, लेकिन जब बच्चे कोई काम सीखने के लिए रुपए मांगते हैं तो वे आनाकानी करते हैं। युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना कोई असंभव काम नहीं है। इसके लिए परिवार, समाज और सरकार - तीनों को प्रयास करने होंगे।

