धरती की सेहत सुधारें

गांव स्तर पर कंपोस्ट इकाइयां बनाएं

धरती की सेहत सुधारें

रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करें

उपजाऊ मिट्टी खेती का आधार होती है। इस पर देश के लोगों का स्वास्थ्य भी निर्भर करता है। पिछले कुछ दशकों में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग ने धरती की सेहत को बहुत नुकसान पहुंचाया है। इस दौरान फसलों का उत्पादन बढ़ा है, लेकिन धरती की सेहत कमजोर हुई है। मिट्टी में घुला हुआ विष फसलों के जरिए इन्सानों में जा रहा है, जिससे लोगों को कम उम्र में ही गंभीर बीमारियां हो रही हैं। ऐसे में, पद्म पुरस्कार प्राप्त किसानों और विशेषज्ञों की हालिया सलाह हमें नई राह दिखाती है। गांव स्तर पर कंपोस्ट इकाइयां बनाने से धरती की सेहत में सुधार आएगा। साथ ही, इससे पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा। अपनी सेहत की फिक्र तो सभी करते हैं। क्या हम धरती की सेहत की फिक्र करेंगे? मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट आना एक गंभीर समस्या है। देश में कई खेत ऐसे हैं, जिनमें पहले खूब फसलें लहलहाती थीं, लेकिन धीरे-धीरे वे बंजर हो गए। वहां किसानों ने यह सोचकर ज्यादा रासायनिक उर्वरकों का छिड़काव किया था कि इससे ज्यादा उत्पादन होगा। शुरुआत में हुआ भी, बाद में वह घटने लगा। ज्यादा रासायनिक उर्वरकों और ज्यादा कीटनाशकों का छिड़काव मिट्टी के सूक्ष्म जीवों को नष्ट कर देता है। कई किसान इस समस्या से जूझ रहे हैं। जब उनके खेतों में फसलों का उत्पादन कम होने लगता है तो वे मिट्टी की जांच नहीं कराते, बल्कि रासायनिक उर्वरकों की मात्रा बढ़ा देते हैं। इससे फायदा होने की जगह नुकसान होता है। वास्तव में इस समस्या का समाधान गांवों में ही मौजूद है। अगर हर गांव में कंपोस्ट इकाइयां लगाकर फसल अवशेष, पशु अपशिष्ट और जैविक कचरे को खाद में बदला जाए तो मिट्टी की उर्वरता में सुधार आ सकता है। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी।

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आज सोशल मीडिया पर कई किसान और विशेषज्ञ न केवल यह मुद्दा उठा रहे हैं, बल्कि समाधान भी बता रहे हैं। एक किसान अपने खेत में बैठकर फसल की गुणवत्ता के बारे में विचार कर रहे थे। उन्होंने देखा कि खेत के एक हिस्से में फसल ज्यादा अच्छी थी। वहां पौधों का रंग गहरा हरा था। उनकी ज्यादा वृद्धि हुई थी। हालांकि उन्होंने खेत के सभी हिस्सों में खाद और पानी की मात्रा समान रखी थी। उन्होंने देखा कि उस दमदार फसल के ऊपर बिजली के तार थे। वहां अक्सर बड़ी संख्या में पक्षी बैठते थे। पक्षियों के अपशिष्ट से मिट्टी को विशेष उर्वरता मिली, जिसका असर फसल में दिखाई दिया। इस अनुभव से प्रेरणा लेकर कई लोगों ने अपने बगीचे में प्रयोग किए। वहां भी नतीजे चौंकाने वाले मिले। भारत में करोड़ों पक्षी हैं। क्या उक्त प्रयोग के आधार पर बड़े स्तर पर ऐसे इंतजाम किए जा सकते हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता में कमी आए? कुदरत में हर जीव का अपनी जगह महत्त्व है। अगर धरती को बचाना है तो पक्षियों का भी संरक्षण करना होगा। हाल में बिहार के सारण जिले के किसानों द्वारा की गई एक पहल बहुत चर्चा में रही। रासायनिक उर्वरकों की बढ़ती कीमत और मिट्टी की घटती गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए किसानों ने पुरानी कृषि परंपरा का सहारा लिया। उन्होंने भेड़पालकों को न्योता दिया, जिसके बाद वे अपनी भेड़ें लेकर आ गए। उनके लिए रात्रि भोजन की व्यवस्था संबंधित किसान द्वारा की जाती है। इस परंपरा के तहत भेड़ें रातभर उस किसान के खेत में बैठती हैं। उनके अपशिष्ट से खेत को प्राकृतिक खाद मिलती है। उसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम जैसे तत्त्व भरपूर मात्रा में होते हैं। किसानों का अनुभव है कि जिस जगह भेड़ें बैठती हैं, वहां अगली फसल बहुत अच्छी होती है। हमें ऐसी परंपराओं को फिर से अपनाने की जरूरत है। धरती स्वस्थ रहेगी तो अन्न में शुद्धता होगी। शुद्ध अन्न से ही स्वस्थ तन और स्वस्थ मन का निर्माण संभव है।

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