इन कृतघ्न संतानों का क्या करें?
सांसद राधा मोहनदास अग्रवाल ने बहुत महत्त्वपूर्ण मुद्दा उठाया है
संस्कार के बिना शिक्षा मानव को दानव बना सकती है
'मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्यार, दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार' - जब निदा फ़ाज़ली ने ये पंक्तियां लिखी थीं, तब परदेस में रहने वाले हिन्दुस्तानी अपने मां-बाप से बात करने के लिए चिट्ठी और तार का सहारा लिया करते थे। अब विज्ञान ने बहुत उन्नति कर ली है। घर-घर में मोबाइल फोन हैं, लेकिन उन मां-बाप का दुखड़ा कौन सुने, जिनकी औलादें परदेस से उन्हें याद ही नहीं करतीं? इस संबंध में राज्यसभा में भाजपा सांसद राधा मोहनदास अग्रवाल ने बहुत महत्त्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जब बूढ़े मां-बाप परलोक सिधार गए, उनके पार्थिव शरीर घरों में लावारिस पड़े रहे, लेकिन परदेस में रहने वाली औलादों ने उनकी सुध नहीं ली! जिन मां-बाप ने कभी अपना पेट काटकर बच्चों की जरूरतें पूरी की थीं, अपने अरमानों का गला घोंटकर उनके लिए कॉलेज फीस जुटाई थी, आज जब वे विदेशी धरती पर थोड़े कामयाब हो गए तो सबसे पहले उन्हीं मां-बाप को बिसरा दिया! यह एक खोखली कामयाबी है, बहुत खतरनाक चलन है। हरियाणा के फतेहाबाद के एक मामले की बहुत चर्चा होती है। एक 80 वर्षीया महिला, जो अकेली रहती थी, का घर में देहांत हो गया। जब पड़ोसियों ने उसे कई दिनों से नहीं देखा तो अनिष्ट की आशंका हुई। उन्होंने पुलिस को सूचना दी और शव को अस्पताल पहुंचाया। महिला का बेटा अमेरिका रहता है। मां का शव घर में पड़ा रहा, इसका सीधा-सा मतलब है कि उसने कई दिनों से बात नहीं की थी। अगर वह रोजाना कम-से-कम एक बार बात करता तो ऐसी नौबत नहीं आती। भारत के एक छोटे-से शहर की यह घटना सोचने को मजबूर कर देती है। दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं।
ऊंची डिग्री, विदेश में नौकरी, मोटी कमाई ... ये सब भौतिक उपलब्धियां हैं। अगर इन्हें हासिल करने के बाद अपने मां-बाप को ही भूल गए तो यह घोर कृतघ्नता है। ऐसे व्यक्ति की सफलता को धिक्कार है। सांसद राधा मोहनदास अग्रवाल ने जो कड़वी सच्चाई पेश की है, उसे बहुत गंभीरता से लेते हुए भारत सरकार को कुछ कड़े कदम उठाने होंगे। यह सिर्फ स्वार्थ, अनदेखी और उदासीनता का मामला नहीं है। इसका सीधा संबंध निर्दयता से है। जो लोग अपने जन्मदाता को यूं मरने के लिए छोड़ देते हैं, उनके शवों को भी देखने नहीं आना चाहते, उन्हें भगवान का तो डर नहीं रहा। कम-से-कम कानून का ही कुछ डर होना चाहिए। जो युवा पढ़ाई या कमाई के लिए विदेश जाएं, उनसे एक शपथ-पत्र जरूर लेना चाहिए कि वे अपने मां-बाप की सेहत और सम्मान का ध्यान रखेंगे। केंद्रीय गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के पास उन युवाओं और उनके माता-पिता के फोन नंबरों का अलग से रिकॉर्ड होना चाहिए। एआई की मदद से ऐसे नंबरों को छांटकर उनकी ओर विशेष ध्यान देना चाहिए, जिन पर औलादें हफ्तों-महीनों बाद बात करती हैं या बिल्कुल बात नहीं करती हैं। संबंधित देश में भारतीय दूतावास द्वारा उन युवाओं के नंबरों पर सूचना भेजी जाए। हर छह महीने में 'ज़िम्मेदारी पूर्ति प्रमाण-पत्र' देने का प्रावधान किया जा सकता है, जिसमें अंतिम ऑडियो या वीडियो कॉल का डिजिटल सबूत पेश करना अनिवार्य हो। एक और उपाय हो सकता है। हालांकि वह थोड़ा सख्त है। जो औलादें विदेश में रहकर अपने मां-बाप की ओर से बिल्कुल ही आंखें मूंद लें, कई बार सूचना देने के बावजूद उनकी सुध लेने में कोई रुचि न दिखाएं, उनके पासपोर्ट रद्द करने पर विचार किया जाए। हमें शिक्षा और उसकी उपलब्धियों पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। संस्कार के बिना शिक्षा मानव को दानव बना सकती है। जो उपलब्धि अपने मां-बाप को ठुकराने को 'मजबूर' कर दे, उसका न मिलना ही बेहतर है।

