अच्छी आदतों से बनाएं बेहतर समाज

पाठ्यक्रम में ऐसी सामग्री होनी चाहिए, जो दैनिक जीवन को आसान व सुरक्षित बनाए

अच्छी आदतों से बनाएं बेहतर समाज

कुछ आदतें राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बन जाती हैं

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने स्कूली पाठ्यक्रम में डिजिटल तथा वित्तीय साक्षरता को शामिल करने की जरूरत पर जोर देते हुए एक महत्त्वपूर्ण मुद्दे की ओर देशवासियों का ध्यान आकर्षित किया है। देश में जिस तरह साइबर धोखाधड़ी के मामले बढ़ रहे हैं, उनके मद्देनज़र स्कूली बच्चों को बचाव के तौर-तरीके बताने चाहिएं। स्कूली पाठ्यक्रम में ऐसी सामग्री होनी चाहिए, जो दैनिक जीवन को आसान व सुरक्षित बनाए। विद्यार्थियों को बचत के फायदों, प्रमुख सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी दी जाए। डाकघर के माध्यम से कई बचत योजनाएं संचालित की जा रही हैं। अगर उनसे स्कूली बच्चों को जोड़ दिया जाए तो भविष्य में उनका आधार और मजबूत हो सकता है। जो बच्चा बचत की आदत सीख लेता है, वह कई बुराइयों से बच जाता है। हर महीने किसी राज्य में फर्जी निवेश योजना का मामला सामने आता है। ऐसा कई दशकों से हो रहा है। कुछ लोग बैंक दर से भी काफी ज्यादा ब्याज देने का वादा करते हैं। वे कम अवधि में ही मालामाल होने के सपने दिखाते हैं। उनके झांसे में आकर काफी लोग 'निवेश' कर देते हैं। शुरुआत में उन्हें कुछ रकम मिलती है। इसके बाद वे और निवेश करते हैं। कुछ महीने बाद कंपनी गायब हो जाती है। ऐसे ठगों को शिकार मिलने में कोई समस्या नहीं होती। वे देशभर में लोगों को ठगते हैं और अपने खजाने भरते हैं। सोशल मीडिया के दौर में उनकी चांदी ही चांदी है। वे फोन कॉल पर लोगों के बैंक खाते खाली करते हैं। अगर स्कूली बच्चों को उनके हथकंडों की जानकारी देकर सावधान कर दिया जाए तो आम जनता का पैसा सुरक्षित हो सकता है।

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स्कूली बच्चों को सिर्फ किताबें न पढ़ाते रहें। उन्हें कुछ ऐसी आदतें सिखाएं, जो भविष्य में अच्छा और जिम्मेदार नागरिक बनने में मदद करें। हमारे घरों तक अनाज कैसे आता है, इसके लिए कितने लोग मेहनत करते हैं, एक किलोग्राम अनाज उगाने में कितने संसाधन लगते हैं, एक बल्ब जलाने के लिए बिजली कहां से आती है, उस पर देश के कितने संसाधन खर्च होते हैं, सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता कितनी जरूरी है, गंदगी से कितनी बीमारियां फैलती हैं, हम अच्छे नागरिक कैसे बन सकते हैं - जैसे सवालों को पढ़ाई का अनिवार्य हिस्सा बनाना चाहिए। बच्चों को ईमानदारी का पाठ जरूर पढ़ाना चाहिए। इसके लिए समय-समय पर परीक्षा लेनी चाहिए। कुछ देशों में किसान और व्यापारी अनूठे तरीके से अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठान चलाते हैं। वहां सिर्फ सामान रखा होता है, कोई व्यक्ति नहीं होता। सामान की कीमत लिखी होती है और ग्राहक को स्वतंत्रता होती है कि वह मनचाहा सामान ले और निर्धारित कीमत रखकर चला जाए। ऐसे प्रतिष्ठान वहीं चलाए जा सकते हैं, जहां लोगों को बचपन से ही ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाए। कुछ आदतें राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बन जाती हैं। दुनिया उन देशों को खास आदतों की वजह से भी जानती है। हर स्कूल को चाहिए कि वह विद्यार्थियों को अच्छी आदतें सिखाए। इसके साथ एक अच्छी आदत पर इतना जोर दिया जाए कि वह उस गांव/शहर की खासियत बन जाए। जैसे- किसी स्कूल के बच्चे यह संकल्प लें कि वे बस से यात्रा करते समय अपनी सीट बुजुर्गों के लिए छोड़ेंगे। किसी स्कूल के बच्चे यह संकल्प लें कि वे अन्य बच्चों और लोगों को विकृत नामों से संबोधित नहीं करेंगे। ऐसी कई अच्छी आदतें हो सकती हैं। उन्हें अपनाकर हम एक सुंदर और बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं। इसके लिए सभी स्कूल पहल करें।

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