आपके मोबाइल फोन की स्क्रीन बन रही मन के लिए जाल!

गाजियाबाद जिले में तीन नाबालिग बहनों ने गलत कदम उठाया था

आपके मोबाइल फोन की स्क्रीन बन रही मन के लिए जाल!

Photo: PixaBay

.. दितिका कानूनगो ..

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बेंगलूरु/दक्षिण भारत। क्या आपका बच्चा घंटों मोबाइल फोन पर कोरियन ड्रामे या के-पॉप वीडियो देखता है? क्या आपने कभी सोचा है कि यह सिर्फ मनोरंजन है या धीरे-धीरे मानसिक दबाव बनता जा रहा है?

हाल में गाजियाबाद जिले में तीन नाबालिग बहनों द्वारा उठाया गया गलत कदम पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर गया। शुरुआती चर्चाओं में कोरियन गेम और ड्रामों के प्रति गहरे आकर्षण की बात सामने आई। इससे पहले तमिलनाडु में दो छात्राएं घर से इसलिए निकल गई थीं, क्योंकि वे कोरिया जाकर बीटीएस बैंड से मिलना चाहती थीं। पुलिस ने समय रहते उन्हें सुरक्षित घर पहुंचा दिया था।

ये घटनाएं एक बड़े सवाल की ओर इशारा करती हैं- क्या डिजिटल मनोरंजन बच्चों की मानसिक सेहत को प्रभावित कर रहा है?

मनोरंजन कब बन जाता है मानसिक पलायन?

कोरियन ड्रामे अपनी भावनात्मक कहानी, परफेक्ट किरदार और ग्लैमरस लाइफस्टाइल के कारण युवाओं में तेजी से लोकप्रिय हुए हैं, लेकिन किशोरावस्था में बच्चे अपनी पहचान बना रहे होते हैं। इस दौरान:

- वे स्क्रीन पर दिख रही जिंदगी से खुद की तुलना करते हैं।
- काल्पनिक दुनिया को वास्तविक मानने लगते हैं।
- अपनी साधारण जिंदगी से असंतोष महसूस कर सकते हैं।

मनोवैज्ञानिक इसे 'फैंडम ऑब्सेशन' कहते हैं यानी प्रशंसा का जुनून में बदल जाना।

बच्चों की मानसिक सेहत पर क्या असर?

1. डोपामिन की लत: लगातार बिंज वॉचिंग दिमाग में रिवार्ड सिस्टम को सक्रिय रखती है, जिससे लत लगने का खतरा बढ़ता है।

2. आत्मसम्मान में गिरावट: परफेक्ट चेहरे और लाइफस्टाइल देखकर बच्चे खुद को कमतर समझ सकते हैं।

3. भावनात्मक अलगाव: कुछ किशोर काल्पनिक किरदारों से ज्यादा जुड़ाव महसूस करने लगते हैं।

4. नींद और पढ़ाई पर असर: रात-रात भर सीरीज देखना दिनचर्या बिगाड़ देता है।

क्यों ऐसे मामले बढ़ रहे हैं?

देशभर में पिछले कुछ वर्षों में ऑनलाइन कंटेंट से प्रभावित होकर घर छोड़ने या जोखिम भरे कदम उठाने की घटनाएं सामने आई हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि डिजिटल एक्सपोजर बढ़ने के साथ मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियां भी बढ़ी हैं। हालांकि हर दर्शक प्रभावित नहीं होता, लेकिन संवेदनशील उम्र के बच्चों पर असर ज्यादा पड़ सकता है।

पाकिस्तानी ड्रामों की बढ़ती लोकप्रियता

भारत में पाकिस्तानी ड्रामे भी तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। उनकी संवेदनशील कहानी दर्शकों को जोड़ती है। सांस्कृतिक आदान-प्रदान सकारात्मक हो सकता है, लेकिन अगर युवा विदेशी जीवनशैली को ही आदर्श मान लें और अपनी वास्तविकता से असंतोष बढ़े, तो यह सामाजिक संतुलन के लिए चुनौती बन सकता है।

माता-पिता क्या करें?

बच्चों को पूरी तरह रोकना समाधान नहीं है। समझदारी से संतुलन बनाना जरूरी है।

- स्क्रीन टाइम तय करें।
- बच्चों से खुलकर बात करें।
- साथ बैठकर कंटेंट देखें
- आउटडोर गतिविधियां बढ़ाएं।
- व्यवहार में बदलाव को नजरअंदाज न करें।

सबसे अहम बात- बच्चे स्क्रीन से नहीं, भावनात्मक खालीपन से जुड़ते हैं।

कोरियन ड्रामे या वेब सीरीज अपने आप में गलत नहीं हैं। समस्या तब शुरू होती है जब उनका अति-उपयोग मानसिक संतुलन पर असर डालने लगे। गाजियाबाद की घटना एक चेतावनी है कि डिजिटल युग में बच्चों की मानसिक सेहत पर गंभीरता से ध्यान देना होगा। मनोरंजन जरूरी है, लेकिन संतुलन उससे भी ज्यादा जरूरी।

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