यह कैसी प्रगतिशीलता?

विवेकशील मनुष्य बुराइयों को किसी समुदाय से जोड़कर नहीं देखता

यह कैसी प्रगतिशीलता?

पूरे समुदाय को बुराई के चश्मे से देखना भी अपनेआप में एक बुराई है

अभिनेता मनोज वाजपेयी की आगामी फिल्म 'घूसखोर ...' एक समुदाय को अपमानित कर प्रचार पाने की ओछी हरकत प्रतीत होती है। कला का यह मतलब नहीं कि पूरे समुदाय पर ही तोहमत लगा दें। भारतीय सिनेमा में निर्माताओं, निर्देशकों, लेखकों और अभिनेताओं का एक ऐसा वर्ग है, जो खुद को प्रगतिशील दिखाने के लिए दूसरों का अपमान करता है तथा इसमें आनंद की अनुभूति करता है। यह वर्ग दशकों से ऐसी फिल्में बना रहा है, जिनके जरिए पंडितों के प्रति लोगों के मन में घृणा भरी जाती है। उन्हें लोभी, लालची और चालाक दिखाया जाता है। ये दोष और दुर्गुण तो किसी भी समुदाय के व्यक्ति में हो सकते हैं। क्या इसके लिए उस समुदाय को ही कठघरे में खड़ा कर देना चाहिए? यह कैसी प्रगतिशीलता है? अगर घूसखोरी जैसी समस्या पर फिल्म बनानी है तो पिछले एक साल में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने जिन अधिकारियों व कर्मचारियों को पकड़ा, उनके बारे में जानकारी जुटाइए। आपको पता चलेगा कि भ्रष्टाचार की वजह किसी व्यक्ति का लालच होता है, न कि एक समुदाय में पैदा होना। भ्रष्टाचार तो पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, म्यांमार, नाइजीरिया में भी है। सबसे ज्यादा ईमानदार और पारदर्शी माने जाने वाले देश भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त नहीं हुए हैं। क्या उसके लिए भारत के किसी एक समुदाय को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? अगर कोई समुदाय बहुत शांतिप्रिय है तो उसे बार-बार निशाने पर लेना उचित नहीं है। फिल्मों का समाज पर बहुत गहरा असर होता है। देश में आजादी के बाद ऐसी फिल्मों की बाढ़-सी आ गई थी, जिनमें विभिन्न समुदायों को खलनायक की तरह पेश किया गया। उन्हें देखकर कोई दर्शक यही सोचेगा कि 'व्यापार करना गलत है, क्योंकि ऐसा काम करने वाला व्यक्ति दूसरों का शोषण करता है।'

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इस गलत सोच ने भारत में उद्यमिता को पनपने नहीं दिया। जब चीन, जापान, जर्मनी जैसे देश नई तकनीक के साथ अपने उद्योगों को बढ़ावा दे रहे थे, तब भारत में कई फिल्में कारखानों को ताला लगाने का संदेश दे रही थीं। इन फिल्मों ने क्षत्रिय समुदाय के साथ बड़ा अन्याय किया। देश की रक्षा में उनके योगदान को सराहा नहीं गया। क्षत्रिय ही थे, जिन्होंने विदेशी आक्रांताओं से लड़ते हुए मातृभूमि के लिए अपने शीश न्योछावर किए थे। क्या कोई इससे इन्कार कर सकता है? उन्हें फिल्मों में दूसरों पर अत्याचार करते हुए ही दिखाया गया। क्या यह एकपक्षीय दृष्टिकोण नहीं है? क्षत्रिय समुदाय में ऐसे अनगिनत लोग हुए हैं, जिन्होंने शरणागत की रक्षा और न्याय की स्थापना के लिए अपने प्राणों तक की परवाह नहीं की। उन्होंने सर्वसमाज की भलाई के लिए हजारों कुओं, बावड़ियों का निर्माण कराया, लेकिन एक लेखक ने कहानी लिखकर दुनिया को यह बताया कि वे किसी को पानी नहीं पीने देते थे! लोगों ने इसे सच भी मान लिया। क्या ऐसे झूठ का प्रसार करना उस समुदाय का अपमान नहीं है? क्या इससे भेदभाव को बढ़ावा नहीं मिलता है? जब समानता, नैतिकता और सद्भावना की बात की जाती है तो इन समुदायों को बाहर क्यों किया जाता है? क्या निर्माताओं, निर्देशकों, लेखकों और अभिनेताओं की कोई बौद्धिक जिम्मेदारी नहीं होती? भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण, उत्पीड़न जैसी बुराइयों के लिए पूरे समुदाय को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अच्छे और बुरे लोग किस समुदाय में नहीं होते? हर समुदाय में ऐसे लोग मिलेंगे जो सत्यवादी, दयालु और परोपकारी होते हैं। इसी तरह झूठे, लालची, दूसरों को पीड़ा देने वाले लोग भी होते हैं। विवेकशील मनुष्य बुराइयों को किसी समुदाय से जोड़कर नहीं देखता। पूरे समुदाय को बुराई के चश्मे से देखना भी अपनेआप में एक बुराई है।

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