बिहार: राजग में सीट बंटवारे के निहितार्थ
क्या यह बिहार में भाजपा के बढ़ते आधार को दर्शाता है?
इससे 'बड़ा भाई' और 'छोटा भाई' का फर्क दूर होगा!
बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर राजग के घटक दलों के बीच सीटों के बंटवारे के गहरे निहितार्थ हैं। भाजपा और जद (यू) ने जब भी गठबंधन की छतरी के नीचे बिहार चुनाव लड़ा, जद (यू) ने खुद को 'बड़े भाई' की भूमिका में रखा। इस बार दोनों समान संख्या (101-101) में उम्मीदवार उतारेंगे। क्या यह बिहार में भाजपा के बढ़ते आधार को दर्शाता है? जद (यू) सीट बंटवारे में परंपरागत रूप से भाजपा से ज्यादा हिस्सेदारी रखता है। इस बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 'बराबरी' पर सहमत हुए हैं तो इस फैसले को उनकी नेतृत्व क्षमता से जोड़कर देखा जाना स्वाभाविक है। क्या राजग के बहुमत पाने की स्थिति में भाजपा अपने किसी विधायक को मुख्यमंत्री बनाएगी या एक बार फिर नीतीश कुमार ही सरकार की कमान संभालेंगे? पिछले विधानसभा चुनाव में जद (यू) ने 115 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। वहीं, भाजपा को 110 सीटें दी गई थीं। इस बार जद (यू) के हिस्से से 14 सीटों की कटौती की गई है। गठबंधन में सीट बंटवारे के दौरान हर पार्टी चाहती है कि उसका हिस्सा ज्यादा रहे। कई बार आपसी खींचतान में गठबंधन टूट जाते हैं। नीतीश कुमार भी पूर्व में राजग छोड़कर महागठबंधन का हिस्सा रह चुके हैं। इस बार उनके रुख को देखकर माना जा रहा था कि वे राजग में ही रहेंगे, लेकिन विधानसभा चुनाव के लिए सीट आवंटन में जद (यू) का पलड़ा भारी रहेगा। क्या इसकी हिस्सेदारी घटना और मुख्य साझेदार से बराबर के साझेदार की नई भूमिका में आना यह संकेत देता है कि अब बिहार में भाजपा मुख्य पार्टी है?
हालांकि सीटों के बंटवारे को इस तरह भी देखा जा सकता है कि भाजपा अपने गठबंधन में बड़े दल को बराबरी का दर्जा देना चाहती है। इससे 'बड़ा भाई' और 'छोटा भाई' का फर्क दूर होगा। कम से कम विधानसभा चुनाव से पहले तो इसी नजरिए से देखा जा सकता है। बाद में, चुनाव नतीजों से तय होगा कि कौन 'बड़ा भाई' है और कौन 'छोटा भाई' है! चिराग पासवान की लोजपा (आर) को 29 सीटें देने से यह संकेत मिलता है कि राजग दलितों और अल्पसंख्यकों में भी अपनी स्थिति मजबूत करने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी अपने हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के लिए कम से कम 15 सीटें मांग रहे थे और मीडिया में उनके 'असंतुष्ट' होने की भी चर्चा थी। उन्हें 6 सीटें देकर राजग ने गठबंधन प्रबंधन और सामाजिक समीकरणों को साधने की रणनीति अपनाई है। इसे राजद के एमवाई समीकरण के जवाब के तौर पर देखा जा सकता है। इसी तरह उपेंद्र कुशवाहा के आरएलएम को 6 सीटें देकर कुर्मी और कुशवाहा वोटबैंक को मजबूत करने की कोशिश की गई है। इसे राजद की रणनीति की काट समझा जा सकता है। इस बार राजग के सामने महागठबंधन के अलावा प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी की चुनौती है। प्रशांत बेरोजगारी और पलायन का मुद्दा जोर-शोर से उठा रहे हैं। वे लालू और नीतीश के साथ भाजपा पर खूब हमले बोल रहे हैं। उनकी नई-नवेली पार्टी पिछले उपचुनाव में कोई खास कमाल नहीं दिखा पाई, लेकिन प्रशांत किशोर भाजपा, जद (यू) और राजद की आलोचना करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। ओवैसी भी लगभग 100 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा कर चुके हैं। इस चुनाव के नतीजे चाहे जो हों, लेकिन इतना तय है कि इस बार बड़ी पार्टियों के वोटबैंक में छोटी पार्टियां सेंध लगाने की खूब कोशिश करेंगी। इससे कुछ सीटों पर नतीजे हैरान कर सकते हैं।

