अपराध और इंटरनेट

अपराध कथाओं पर बहस होनी चाहिए

अपराध और इंटरनेट

क्या मानव समाज कभी अपराध से मुक्त हो पाएगा?

बंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता का एक कार्यक्रम में यह कहना प्रासंगिक है कि आज इंटरनेट जघन्य अपराधों की बड़ी वजह बन गया है। पिछले कुछ वर्षों में इंटरनेट का तेजी से प्रसार हुआ है। महानगरों से लेकर ढाणियों तक इंटरनेट की पहुंच हो गई है। इसके सकारात्मक प्रभाव जरूर हैं, लेकिन नकारात्मक प्रभावों की भी कमी नहीं है। अब अच्छे-बुरे हर विषय से संबंधित सामग्री आसानी से उपलब्ध हो गई है। जिसकी जैसी मानसिकता है, वह उसे देखता है और उसी के मुताबिक गतिविधियां करता है। 

आज इंटरनेट पर पढ़ाई, स्वास्थ्य, पकवान, बैंकिंग, खेल समेत ऐसी सामग्री आसानी से मिल जाती है, जिनके लिए एक दशक पहले किताब खरीदनी होती थी, जिसके लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था। दूसरी ओर, इंटरनेट बम बनाने, आत्महत्या करने, कार लूटने, एटीएम उखाड़ने, वेबसाइट हैक करने समेत अनगनित 'काम' सिखाता है, जो मानव जीवन को संकट में डाल सकते हैं, सभ्य समाज के लिए बड़ा खतरा पैदा कर सकते हैं। 

भारत सरकार को ऐसे कीवर्ड पर सख्त नज़र रखनी चाहिए। जो वीडियो समाज के लिए हानिकारक हो सकते हैं, उन्हें ब्लॉक करना चाहिए। इंटरनेट सुविधा ने अपराध कथाओं को बड़ा मंच दे दिया, लेकिन इसके भी दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। अमेरिकी टीवी सिरीज ‘डेक्सटर’ का नाम इन दिनों खूब चर्चा में है, जिसे देखकर आफताब पूनावाला नामक युवक को लिव इन पार्टनर श्रद्धा वाल्कर की हत्या और लाश को 'ठिकाने' लगाने का ख़याल आया था।

अपराध कथाओं पर बहस होनी चाहिए। यह सच है कि इसके सिर्फ एक पहलू को नहीं देखा जा सकता। अपराध कथाएं यह भी बताती हैं कि खुद को जागरूक रखकर समाज को अपराध से मुक्त कैसे किया जाए। वहीं, कुछ लोग इससे अपराध करने का नुस्खा तलाश लेते हैं। ‘डेक्सटर’ जैसी टीवी सिरीज रक्तपात की घटनाओं से भरपूर होती हैं, जो कुछ लोगों के मन में अपराध की भूख जगा सकती हैं। इसी तरह हिंदी फिल्म ‘दृश्यम’ देखकर उसकी तर्ज पर आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने की खबरें सामने आई थीं। 

क्या मानव समाज कभी अपराध से मुक्त हो पाएगा? संभवत: अभी इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ने के लिए उचित समय नहीं है। अभी हमें यह ढूंढ़ना चाहिए कि बढ़ते अपराधों में कमी कैसे लाई जाए। खासतौर से जिन अपराधों को अंजाम देने में कहीं न कहीं इंटरनेट भी मददगार साबित हो रहा है, उन पर प्रभावी नियंत्रण कैसे पाया जाए? चूंकि अपराध में तकनीक का उपयोग बढ़ता जा रहा है, इसलिए उसे नियंत्रित करने के लिए उपाय भी तकनीक में ढूंढ़ा जाए। 

जांच एजेंसियों को अत्याधुनिक तकनीक एवं प्रशिक्षण से इतना सक्षम बना दिया जाए कि अपराधी कानून के शिकंजे से बच न पाए। उदाहरण के लिए, इन दिनों धड़ल्ले से जारी ऑनलाइन धोखाधड़ी की घटनाओं को ही देखें तो साइबर ठग बेखौफ नज़र आते हैं। उन पर काबू पाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। 

अपराधी जिन खामियों का फायदा उठाते हैं, उन्हें दूर किया जाए। इसके अलावा कठोर दंड देकर नजीर पेश की जाए। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सुरक्षित इंटरनेट का निर्माण करे। इसे अपराध का अड्डा बिल्कुल न बनने दिया जाए।

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