सरकारी स्कूलों की चिंता या कोरा दिखावा?
क्या सरकारी स्कूलों की दशा रातोंरात बिगड़ गई?
पिछले एक दशक में कई सरकारी स्कूल बंद हो गए
इन दिनों कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों को देश में सरकारी स्कूलों और शिक्षा की स्थिति की बहुत चिंता हो रही है। यह चिंता हर विचारशील मनुष्य को होती है। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके को भी हो रही है, जिन्होंने गांवों में सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए देशव्यापी अभियान की घोषणा की है। हाल में कांग्रेस ने अपने फेसबुक पेज पर यह कहते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तीखे सवाल पूछे थे कि देश में रोजाना 25 सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं! ऐसे में यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि सरकारी स्कूलों की चिंता करते हुए कांग्रेस खुद को अकेली न समझे। अभिजीत दीपके दोबारा मोर्चा संभालने आ रहे हैं। सवाल है- क्या सरकारी स्कूलों की दशा रातोंरात बिगड़ गई? जिन राज्यों में कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों की सरकारें हैं, क्या वहां सरकारी स्कूल अमेरिका, सिंगापुर, चीन, जापान और जर्मनी के स्कूलों को टक्कर दे रहे हैं? कांग्रेस के पास सुनहरा मौका है। वह हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना के सरकारी स्कूलों को शिक्षा की गुणवत्ता के मामले में ऐसा बना दे कि दुनिया देखे तो वाह-वाह करे। इनमें इतनी सुविधाएं दे कि उक्त देशों के बच्चे अपने नाम कटवाकर यहां दाखिला लेने के लिए कतारों में खड़े नजर आएं। इसमें कोई शक नहीं कि पिछले एक दशक में कई सरकारी स्कूल बंद हुए हैं। वे बंद क्यों हुए हैं, इस पर भी चर्चा होनी चाहिए। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर इतना गिर गया कि लोग अपने बच्चों को इनमें भेजना नहीं चाहते हैं। कई सरकारी शिक्षक ऐसे हैं जो हर महीने मोटा वेतन लेते हैं, सरकारी स्कूलों के उत्थान को लेकर बड़े-बड़े भाषण देते हैं, शिक्षा में सुधार की बातें करते हैं, विद्यार्थियों को कथनी-करनी एक रखने का उपदेश देते हैं, लेकिन अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजते हैं।
कमोबेश यही रवैया राजनेताओं का है। जो नेतागण सरकारी स्कूलों के लिए खुद को इतने फिक्रमंद दिखा रहे हैं, जरा यह बताएं कि उनके बच्चे कहां पढ़ते हैं/थे? आज कितने सांसद और विधायक ऐसे हैं, जो अपने निर्वाचन क्षेत्र में आने वाले सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ने भेजते हैं? यह सवाल सिर्फ कांग्रेस के नेताओं से नहीं है, बल्कि सभी दलों के नेताओं से है। ज्यादातर नेताओं के बच्चे निजी स्कूलों में जाते हैं। कितने ही नेता ऐसे हैं, जो संसद और विधानसभा में अपनी सरकारों का गुणगान करते हुए बताते हैं कि हमने इतने शानदार स्कूल और कॉलेज बना दिए, जबकि उनके बच्चे विदेश रहते हैं, वहीं पढ़ते हैं। अगर सरकारों ने वास्तव में अपने स्कूलों-कॉलेजों में बहुत सुधार कर दिए तो इनका फायदा सिर्फ मजदूर, किसान और आम इन्सान के बच्चों तक सीमित क्यों रहना चाहिए? सांसदों, विधायकों, सरकारी अधिकारियों के बच्चों को भी फायदा मिलना चाहिए! उनके साथ यह भेदभाव नहीं होना चाहिए। दिल्ली में जंतर-मंतर पर जो लोग जेन जी को उसका हक दिलाने के लिए क्रांतिकारी नारे लगा रहे थे, उनके परिवारों के कितने बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं? जो युवा वहां इकट्ठे हुए थे, उनमें से कितने सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी रहे हैं? अगर इन सवालों के जवाब ढूंढ़ेंगे तो इस सवाल तक जरूर पहुंचेंगे- सरकारी नौकरी सबको चाहिए, लेकिन सरकारी स्कूल किसको चाहिए? जब लोगों की आर्थिक स्थिति थोड़ी-सी बेहतर हो जाती है तो वे निजी स्कूलों को प्राथमिकता देते हैं। कुछ अपवाद जरूर हो सकते हैं। उनके आधार पर सबके लिए राय नहीं बनाई जा सकती। सरकारी स्कूलों की चौतरफा उपेक्षा की गई, जिसका नतीजा आज सबके सामने है। इन स्कूलों को बंद करने के बजाय बेहतर बनाना चाहिए। इसके लिए सभी जनप्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों, खासकर सरकारी शिक्षकों के लिए अपने क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में ही अपने बच्चों को पढ़ाना अनिवार्य होना चाहिए। इसके लिए सरकार को कानूनी रास्ते तलाशने चाहिएं। इस एक उपाय से देश के हजारों सरकारी स्कूलों की दशा सुधर जाएगी।

