यह कैसा छात्र आंदोलन?
इसका छात्रहित से कोई लेना-देना नहीं है
ये संसद भवन में घुसकर अव्यवस्था और अभद्रता का तांडव करना चाहते हैं
नीट पेपरलीक के विरोध में राष्ट्रीय राजधानी में शुरू किए गए कथित छात्र आंदोलन की परतें खुलने लगी हैं। यह चंद मौकापरस्त लोगों का जमघट है, जिसके पीछे गहरी साजिश का शक होता है। ये लोग देश के युवाओं को भड़का कर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं। 'कॉकरोच जनता पार्टी' के नाम से ही स्पष्ट है कि इसका छात्रहित से कोई लेना-देना नहीं है। ये लोग उपद्रव मचाना चाहते हैं। ये अराजकता फैलाकर पूरी व्यवस्था को तहस-नहस करना चाहते हैं। सोनम वांगचुक लद्दाख में पर्यावरण बचाते-बचाते किन चक्करों में पड़ गए? उन्हें भूख हड़ताल के झमेले में फंसाकर बाकी लोग आराम से पिज्जा-बर्गर की दावत उड़ा रहे थे। यह कैसा आंदोलन है? इन हुड़दंगियों का छात्र आंदोलन से उतना ही संबंध है, जितना तीन कृषि कानूनों के खिलाफ कथित किसान आंदोलन का किसानों से संबंध था। उसमें किसानों के वेश में आए कई उपद्रवियों ने भारी बवाल मचाया था। वे शुरू से ही यह मंशा लेकर आए थे। वे दिल्ली को बंधक बनाना चाहते थे। उन्हें केंद्र सरकार के खिलाफ कोई मुद्दा मिल नहीं रहा था। चूंकि किसानों से लोगों को हमदर्दी होती है, इसलिए मौका देखकर किसान का वेश धारण किया और अपना असली रंग दिखाया था। अब दिल्ली में छात्र आंदोलन के नाम पर यही हो रहा है। बस वेश का फर्क है। इसमें ऐसे कई लोग शामिल हैं, जिन्हें नीट का मतलब भी मालूम नहीं है। पहले, उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा था। उसके बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का इस्तीफा मांगने लगे। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस्तीफा मांग रहे हैं। इनकी मांगों की सूची हर दिन बढ़ती जा रही है।
ये संसद भवन में घुसकर अव्यवस्था और अभद्रता का तांडव करना चाहते हैं। कोई 'तिलक, तराजू और तलवार ...' जैसे नारे लगाकर नकली क्रांतिवीर बन रहा है, तो कोई भगवान श्रीराम और मां सीता का मजाक उड़ाकर पाखंडी बुद्धिजीवी बन रहा है। एक महिला ने गर्व से सांप्रदायिक नारा दोहराकर खुद ही इस मज्मे की पोल खोल दी। दरअसल यह तमाशबीनों का जमावड़ा है, जिसमें नीट के मुद्दे के अलावा वे सारे मुद्दे उठाए जा रहे हैं, जिन्हें देश की जनता पहले ही नकार चुकी है। एक और सवाल यह है कि अहिंसक आंदोलन के दावे के बावजूद इनके पास इतने पत्थर कहां से आए? आंदोलन में शामिल कई लोग खुलकर कह रहे हैं कि हम भारत के हालात नेपाल जैसे बना देंगे। ये दिल्ली को ढाका और काठमांडू बनाना चाहते हैं। ये इसके लिए पूरी आज़ादी चाहते हैं। इसका क्या मतलब है? साफ क्यों नहीं कहते कि छात्र आंदोलन एक बहाना है, असल मकसद तो संसद भवन को कब्जाना है? ये हाथ में महात्मा गांधी और भगत सिंह के चित्र लेकर चल रहे हैं। महापुरुषों के चित्र के साथ उनके चरित्र से भी कुछ सीखें। उन्होंने अपने देश में हाहाकार मचाने, हिंसा के लिए जनता को भड़काने और भगवान के अवतारों का मजाक उड़ाने के लिए नहीं कहा था। उपद्रवियों की हरकतों से साफ पता चलता है कि इनमें से ज्यादातर लोग देशविरोधी मानसिकता के साथ इकट्ठे हुए हैं। ये कई वर्षों से तोड़फोड़ करने का बहाना ढूंढ़ रहे थे, जो अब मिला है, लेकिन ये अपनी पुरानी आदतों से पीछा नहीं छुड़ा सके, इसलिए पहले ही दिन बेनकाब हो गए। कांग्रेस समेत विपक्ष के कई नेता पुलिस द्वारा इन्हें रोके जाने और कार्रवाई करने को लोकतंत्र एवं संविधान की हत्या और घोर क्रूरता बता रहे हैं। याद करें, जून 2011 में जब स्वामी रामदेव ने काला धन और भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते हुए अनशन किया था, तब पुलिस ने किसके आदेश पर लाठियां बरसाई थीं? तब केंद्र में किसकी सरकार थी, गृह मंत्री कौन था? इस बार पुलिस ने बहुत संयम से काम लिया है। उसने सोनम वांगचुक को सम्मानपूर्वक अस्पताल पहुंचाया। और वह भी न्यायालय के निर्देशों के अनुसार। अगर न पहुंचाती तो उनका जीवन गंभीर संकट में पड़ता। 'कॉकरोच जनता पार्टी' वाले बर्गरवीर उस मौके को भुनाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते।

