दो दशक बाद कोलकाता लौटेंगी तस्लीमा नसरीन
वे एक साहित्यिक कार्यक्रम में शामिल होंगी
Photo: nasreen.taslima FB Page
कोलकाता/दक्षिण भारत। अपनी लेखनी के कारण कोलकाता छोड़ने पर मजबूर होने के लगभग दो दशक बाद, बांग्लादेश से निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन अगले महीने एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए शहर लौट रही हैं।
यह एक राजनीतिक रूप से अहम घटना है, जिसे पश्चिम बंगाल की बीजेपी सरकार मजहबी कट्टरपंथ के सामने लंबे समय से चली आ रही घुटने टेकने की नीति को पलटने के तौर पर पेश कर रही है।नसरीन ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर किया कि वे एक अगस्त को कोलकाता में रबींद्र सदन में कट्टरपंथ-विरोधी साहित्यिक कार्यक्रम में शामिल होंगी, जहां उनके कविता पाठ करने की उम्मीद है।
धर्मनिरपेक्ष और कट्टरपंथ-विरोधी संगठनों के एक समूह द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का महत्त्व साहित्य के दायरे से कहीं आगे बढ़ गया है। यह कार्यक्रम पश्चिम बंगाल में भाजपा के सत्ता में आने के कुछ महीनों बाद और अभिव्यक्ति की आज़ादी, धर्मनिरपेक्षता तथा धार्मिक भावनाओं के प्रति राज्य के रवैए को लेकर फिर से शुरू हुई राजनीतिक बहस के बीच हो रहा है।
एक आयोजक ने कहा कि यह असल में उनके 20 साल बाद शहर आने का जश्न मनाने का कार्यक्रम होगा। 21 नवंबर, 2007 को तत्कालीन लेफ्ट फ्रंट सरकार के कट्टरपंथी ताकतों के सामने झुकने के बाद उन्हें कोलकाता छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। यह नया बंगाल है और हमने उन्हें सम्मानित करने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी खुद इस कार्यक्रम में मौजूद रहेंगे।
जब उनसे पूछा गया कि क्या यह कार्यक्रम शहर में उनकी वापसी का संकेत है, तो आयोजक ने कहा कि अभी तक इस बारे में कोई चर्चा नहीं हुई है।
एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा, 'लगातार सत्ता में रहीं लेफ्ट फ्रंट और तृणकां सरकारों ने उनकी वापसी में मदद करने से इन्कार करके अभिव्यक्ति की आज़ादी के बजाय राजनीतिक सुविधा को प्राथमिकता दी, जबकि उन्होंने साहित्यिक कार्यक्रमों और पुस्तक मेलों के लिए कोलकाता आने के वास्ते बार-बार अपील की थी।'
पिछले साल यह मुद्दा फिर से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया, जब भाजपा के राज्यसभा सांसद एवं पश्चिम बंगाल में पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने संसद में केंद्र सरकार से नसरीन की कोलकाता वापसी में मदद करने की अपील की थी। उन्होंने नसरीन को एक ऐसी दुर्लभ आवाज़ बताया, जिन्होंने बांग्लादेश में लगातार कट्टरपंथ को चुनौती दी है।


