यह बौद्धिक अन्याय क्यों?
बुरे चरित्र के लोग किस समाज में नहीं हैं?
कुछ लोग कला के नाम पर खुराफात करते रहते हैं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस के शासन काल में सुस्त विकास दर को हिंदू समाज से जोड़े जाने का उल्लेख कर उस अतीत की याद दिलाई है, जिसके बारे में युवा पीढ़ी को कम ही जानकारी है। उस ज़माने में पाकिस्तान में भी इस बात को लेकर हमारा बहुत मजाक बनाया जाता था। भारत ने आर्थिक सुधारों के बल पर धीरे-धीरे उस गलत धारणा को बदल दिया। देश में आज़ादी से बहुत पहले, सुधारवाद के नाम पर ऐसी विचारधाराओं ने जड़ें जमा ली थीं, जो हर बुराई को हिंदू समाज से जोड़कर देखती थीं। ऐसे कथित बुद्धिजीवियों की कमी नहीं रही, जो हर समस्या का दोष हिंदू समाज, उसमें भी ब्राह्मण समाज पर डालकर गर्व महसूस करते हैं। डेढ़ दशक पहले तक कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में देवी-देवताओं पर चुटकुले सुना दिए जाते थे। अगर कोई व्यक्ति उन पर आपत्ति जताता तो उसे असहिष्णु घोषित कर खामोश रहने के लिए मजबूर कर दिया जाता था। आपने कहानियों, फिल्मों, धारावाहिकों आदि में एक वाक्य जरूर पढ़ा-सुना होगा- 'वह तो ह...स का पुजारी है!' क्या ऐसे शब्दों का निर्माण उस समाज का अपमान नहीं है, जो अल्प संसाधनों में सदियों से भगवान की सेवा कर रहा है? बुरे चरित्र के लोग किस समाज में नहीं हैं? क्या कोई व्यक्ति यह दावा कर सकता है कि वह जिस समाज से आता है, वहां सभी दूध के धुले हैं? अखबारों, टीवी चैनलों, सोशल मीडिया में रोजाना ही ऐसी खबरें आती रहती हैं, लेकिन जनता के मन में यह बात बैठा दी गई कि बुरे लोग सिर्फ एक समाज से आते हैं। क्या यह दुर्भावनापूर्ण कृत्य नहीं है? क्या यह अक्षम्य अपराध नहीं है? क्या यह उस समाज के साथ बौद्धिक अन्याय नहीं है?
कुछ लोग कला के नाम पर खुराफात करते रहते हैं। इससे वे जल्द ही सुर्खियों में जगह बना लेते हैं। उन्हें आपत्तिजनक चित्र बनाने के लिए हिंदू देवी-देवता ही याद आते हैं। ऐसे ही एक कथित कलाकार ने देवताओं और भारत माता का चित्र बनाया था। जब लोगों ने उसका विरोध किया तो यह कहते हुए उनकी बुद्धि पर सवाल खड़े किए गए कि 'आपकी सोच पिछड़ी हुई है, महान कलाकार का चित्र समझना आपके बस की बात नहीं है!' यह अलग बात है कि वह कथित कलाकार बाद में कतर जाकर बस गया था। उसने वहां स्थानीय संस्कृति को लेकर ऐसी कोई कलाकारी नहीं दिखाई। अगर दिखाता तो बदले में कतर सरकार की ओर से फांसी का फंदा पाता। आश्चर्य की बात है कि यहां उसे राज्यसभा की सदस्यता, पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण जैसे सम्मान मिलते रहे। उसकी कलाकारी का भ्रम इन दिनों टूट रहा है। हाल में सोशल मीडिया पर उसका एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वह नब्बे के दशक की एक मशहूर अभिनेत्री, जिसका वह खुद बड़ा प्रशंसक था, का चित्र बनाता नजर आता है। अभिनेत्री भी बड़ी उत्सुक दिखाई देती है कि 'इतना बड़ा कलाकार मेरा चित्र बना रहा है तो न जाने कितना अद्भुत बनाएगा!' कलाकार महोदय ने दो-चार आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचीं और ब्रुश-रंग आदि वहीं पटक कर चलते बने। आज उस चित्र को देखकर लोग लोटपोट हो रहे हैं। उनका कहना है कि इससे अच्छा चित्र तो तीसरी कक्षा का बच्चा बना सकता है। उस समय अभिनेत्री ने भी अपना माथा पकड़ लिया होगा कि यह क्या बना दिया! हमारे देश में दशकों तक ऐसे लोगों पर पुरस्कार लुटाए जाते रहे, जो हिंदू विरोधी मानसिकता रखते थे। हालांकि अब चीजें बदल रही हैं। लोग जागरूक हो रहे हैं। वे आपत्ति जता रहे हैं। वे सोशल मीडिया पर एकजुट होकर अपनी आवाज उठा रहे हैं। खुराफाती मानसिकता वाले कथित कलाकार भी अपनी हरकतों से परहेज कर रहे हैं। यह अच्छी बात है। इसका स्वागत होना चाहिए। सबकी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।

