सारनाथ: जहां आज भी गौतम बुद्ध के 'पहले प्रवचन’ की सुनाई देती है गूंज
सारनाथ संग्रहालय में चार मुख वाला सिंह शीर्ष चिह्न है आकर्षण का केन्द्र
(बाएं) संग्रहालय में रखा अशोक स्तंभ का चार मुख वाला सिंह शीर्ष। (दाएं) सारनाथ में धमेक स्तूप एवं अन्य स्मारक।
.. देवेंद्र शर्मा ..
बनारस/दक्षिण भारत। उत्तर प्रदेश के बनारस शहर से लगभग 13 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में स्थित है सारनाथ। सारनाथ दुनिया के सबसे ज़रूरी बौद्ध तीर्थ स्थलों में से एक है, क्योंकि यह वह जगह है जहॉं गौतम बुद्ध ने ज्ञान पाने के बाद अपना पहला उपदेश दिया था, उस स्थल को ’धर्मचक्र प्रवर्तन स्तूप’ (धमेक) के नाम से जाना जाता है। सारनाथ बौद्ध कला, वास्तुशिल्प व पाषाणकला के क्षेत्र में बहुत ही मशहूर है, जिसमें धमेक स्तूप और अशोक स्तंभ शामिल हैं।सारनाथ का एक लंबा और समृद्ध इतिहास है, जो छठी सदी का है। यह प्राचीन भारत में व्यापार और उद्योग का एक बड़ा सेंटर था, जो गंगा नदी के किनारे बसा था और उस समय एक बड़ा परिवहन का रास्ता था। 528 बीसी ईसा में बुद्ध पहली बार सारनाथ आए थे और अपने पांच शिष्यों को अपना पहला उपदेश दिया, जिसे 'डीयर पार्क प्रवचन’ के नाम से जाना जाता है। बुद्ध ने चार आर्य सत्य सिखाए, जो बौद्ध धर्म की नींव बने और अष्टांगिक मार्ग जो ज्ञान का मार्ग है। सारनाथ बौद्ध शिक्षा और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया और वहां कई मठ और मंदिर बनाए गए। माना जाता है कि तीसरी शताब्दी बीसी ईसा में मौर्य सम्राट अशोक सारनाथ आए और उन्होंने मशहूर अशोक स्तंभ बनवाया, जिस पर एक ऐसा शिलालेख है जो अहिंसा और धार्मिक सहनशीलता को बढ़ावा देता है। 7वीं शताब्दी बीसीईसा में, सारनाथ पर मुस्लिम आक्रंताओं ने कब्ज़ा कर लिया और सारनाथ को नष्ट कर दिया और पूरे स्थल को तहस नहस कर दिया। पुराने शहर के ये खंडहर बाद में 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश आर्कियोलॉजिस्ट द्वारा पुन: खोजा गया और खुदाई में अनेक मूर्तियॉं, स्तंभों के अवशेष, प्राचीन शिलालेख और पत्थर की उत्कृष्ट कारीगरी मिली। आज सारनाथ बौद्ध धर्म को मानने वालों और दूसरे पर्यटकों व यात्रियों के लिए एक ब़ड़ा पर्यटन स्थल बन गया है।
बुद्ध के पहले प्रवचन का साक्षी है धमेक स्तूप
धमेक स्तूप, जो 5वीं सदी बीसी का है, सारनाथ की सबसे मशहूर जगहों में से एक है, और माना जाता है कि यह वह जगह है जहॉं बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। लगभग 43 मीटर ऊँचा और मजबूत पत्थरों से निर्मित यह धमेक स्तूप बौद्ध धर्म के पवित्रतम स्थलों में गिना जाता है। इसके निचले हिस्से पर बनी हुई बारीक पत्थर की नक्काशी और ज्यामितिय डिज़ाइन प्राचीन भारतीय वास्तुकला का शानदार उदाहरण है। कहा जाता है कि सम्राट अशोक ने इस स्तूप में गौतम बुद्ध की अस्थियां रखी थीं। सारनाथ की दूसरी खास जगहों में मूलगंध कुटी विहार शामिल है, जो 20वीं सदी में बना एक मॉडर्न बौद्ध मंदिर है, सारनाथ म्यूज़ियम, जिसमें बौद्ध कलाकृतियों और वास्तु कला का एक बड़ा कलेक्शन है और चौखंडी स्तूप बहुत प्रसिद्ध है।
पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) बेंगलूरु की सहायक निदेशक करिश्मा पंत के नेतृत्व में कर्नाटक से लगभग 10 मीडिया हाउस के प्रतिनिधियों ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंतर्गत आने वाले सारनाथ संग्रहालय का अवलोकन किया। संग्रहालय में मौजूद गाइड ने प्रतिनिधिमंडल को बताया कि सारनाथ का पुरातात्त्विक संग्रहालय भारत के सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण संग्रहालयों में से एक है। यहॉं मौर्य, कुषाण और प्राचीन काल की अनेक दुर्लभ ऐतिहासिक धरोहरें सुरक्षित हैं, जो इस क्षेत्र की हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता और धार्मिक इतिहास को दर्शाती हैं। संग्रहालय में बौद्ध धर्म से संबंधित अनेकों नमूने देखे जा सकते हैं।
भारत गणराज्य का 'आधिकारिक राष्ट्रीय प्रतीक’ स्थापित है सारनाथ में
संग्रहालय की सबसे प्रमुख और अमूल्य धरोहर अशोक स्तंभ का चार मुख वाला सिंह शीर्ष शामिल है, जिसे सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में स्थापित कराया था। यही चार मुख वाला सिंह शीर्ष चिह्न आज भारत गणराज्य का ’आधिकारिक राष्ट्रीय प्रतीक’ भी है। इस ’चौमुखी सिंह मूर्ति’ में पाषाण कला, प्राकृतिक चमक और कलात्मक सौंदर्य प्राचीन भारतीय स्थापत्य और मूर्तिकला के उच्च स्तर की झलक दिखाई देती है। संग्रहालय के विभिन्न 3 गैलरियों में रखी गई बौद्ध प्रतिमाएँ और अवशेष इस बात की गवाही देते हैं कि सारनाथ सदियों तक बौद्ध धर्म के प्रमुख शैक्षणिक और धार्मिक केंद्रों में से एक रहा है। पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार सारनाथ का ऐतिहासिक महत्व केवल धार्मिक दृष्टि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन सभ्यता, ललित कलाओं और स्थापत्य परंपरा का भी एक जीवंत उदाहरण है। हर भारतीय को बनारस में काशी विश्वनाथ मंदिर के साथ साथ सारनाथ का भी दौरा अवश्य करना चाहिए।


