हमारे पेय उपेक्षित क्यों?

हमारे देश में सैकड़ों नहीं, बल्कि हजारों किस्म के पेय हैं

हमारे पेय उपेक्षित क्यों?

हमें देसी पेय का प्रचार करना चाहिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गर्मी से बचाव के लिए 'मन की बात' कार्यक्रम की 134वीं कड़ी में देशवासियों को जो सुझाव दिए हैं, वे अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। अक्सर लोग समय के साथ कई चीजों को पुरानी समझने लगते हैं। इससे उनका चलन कम हो जाता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे लौटकर नहीं आएंगी। हमारे देश में सैकड़ों नहीं, बल्कि हजारों किस्म के ऐसे पेय हैं, जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं। उनके पीछे हमारे पूर्वजों का सदियों पुराना अनुभव है। जब वातावरण में हल्की ठंडक हो, तब क्या पीना चाहिए? जब गर्मी बढ़ जाए, तब क्या पीना चाहिए? जब लू चलने लगें, तब कौनसी चीज कितने अनुपात में मिलाकर पीनी चाहिए, कब पीनी चाहिए? इन सबके पीछे गहरा विज्ञान है। भारत में सर्दी, गर्मी, बरसात ... हर मौसम के लिए पेय निर्धारित हैं। फिर भी नई पीढ़ी ऐसे विदेशी शीतल पेयों की दीवानी है, जो उसकी सेहत चौपट करते हैं। उनकी निर्माण विधि के पीछे हानिकारक रसायनों का घालमेल है, ऋतुओं का कोई विज्ञान नहीं है। राजस्थान में जब गर्मी बढ़ने लगती है, तब गांवों में लोग मिट्टी के बर्तन में बाजरे के आटे की राबड़ी बनाते हैं। उसे छाछ के साथ मिलाकर पीते हैं। यह मिश्रण लू से बचाता है। जिसे अनिद्रा की समस्या हो, वह एक बार राबड़ी पीकर देखे। बाजरा बहुत पौष्टिक होता है। जैसे ही बारिश की हवा दस्तक देती है, राबड़ी का स्वाद बदल जाता है। इस पेय का वैसा प्रचार क्यों नहीं होता, जैसा विदेशी शीतल पेयों का होता है? बड़े-बड़े फिल्मी सितारे, खिलाड़ी, सेलिब्रिटी गर्दन ऊंची कर उन पेयों की बोतलें गटकने में बड़प्पन महसूस करते हैं। कई लोग उनकी नकल करते हुए मन में यह भ्रम पाल लेते हैं कि इससे हम भी महान और आधुनिक हो जाएंगे! इस सोच की वजह से, हमारे पेय सस्ते, सुलभ और स्वास्थ्यवर्द्धक होने के बावजूद उपेक्षित हैं।

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भारत में सुबह खाली पेट चाय पीने के चलन से पाचन संबंधी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। कई लोग गर्मियों में सुबह 10 बजे से पहले दो कप या इससे ज्यादा चाय पी लेते हैं। इससे पेट में अम्लता बढ़ती है। देर तक खाली पेट रहने, कम पानी पीने से शरीर में ऐसी समस्याएं पैदा होने लगती हैं, जो बाद में महंगी पड़ती हैं। तब अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। हजारों रुपए की दवाइयां खानी पड़ती हैं। अगर सुबह चाय की मात्रा बहुत कम कर दी जाए और एक गिलास सत्तू पीने की आदत डाली जाए तो दिनभर ऊर्जा महसूस होती है। चना और जौ को पीसकर उसमें पानी, नमक (ऋतु के अनुसार सामग्री में परिवर्तन संभव है) आदि डालने से यह ऊर्जावर्द्धक पेय बन जाता है। इसे बनाने के लिए एक भी चीज विदेश से आयात नहीं करनी पड़ती है, यानी पूर्णत: भारतीय और हमारी अर्थव्यवस्था के लिए लाभदायक पेय! सुबह चाय पर चाय पीने से बेहतर है- सत्तू पीना। आश्चर्य की बात है कि इसे सिर्फ कुछ राज्यों का पेय माना जाता है। पश्चिमी जीवन शैली से प्रभावित लोग इसे मजदूरों और कम पढ़े-लिखे लोगों का पेय भी कह देते हैं। यह बिल्कुल ही गलत सोच है। मजदूर होना कोई शर्म की बात नहीं है। अगर कोई मजदूर सत्तू पीकर दिनभर कड़ी मेहनत करता है तो वह इस देश के विकास में योगदान देता है। महानगर का उच्च शिक्षित व्यक्ति हो या गांव का मजदूर हो, सबकी शरीर रचना तो एक जैसी ही है। प्रकृति ने पाचन तंत्र, तंत्रिका तंत्र, रक्त परिसंचरण तंत्र ... एक जैसे ही बनाए हैं। हानिकारक चीजें सबको हानि पहुंचाएंगी, चाहे उनका सेवन करने वाला कितना ही आधुनिक हो। इसी तरह लाभदायक चीजें सबके लिए लाभदायक होंगी। हमें छाछ, राबड़ी, सत्तू, लस्सी, पेड़ा लस्सी, गुलाब लस्सी, आम पना, बील का शर्बत, गुलाब का शर्बत, नींबू पानी आदि का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार करना चाहिए, जिस तरह हाल में प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी इटली की समकक्ष जॉर्जिया मेलोनी को टॉफी का एक पैकेट उपहार में दिया था। अब सोशल मीडिया का ज़माना है। देसी पेय के प्रचार के लिए इससे सुनहरा मौका कोई और नहीं हो सकता है।

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