इमरान का भ्रम

इमरान का भ्रम

सत्ता से इमरान की विदाई का मुहूर्त उसी समय निकल गया था, जब उन्होंने सेना से टकराव मोल लिया


पाकिस्तान में एक युवक द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को निशाना बनाने की कोशिश में की गई गोलीबारी बताती है कि इस पड़ोसी देश में कट्टरता किस हद तक जड़ें जमा चुकी है। जब इमरान सत्ता में आए थे तो उम्मीद थी कि वे देश को उदारता की ओर लेकर जाएंगे, भारत के साथ संबंधों को मधुर नहीं तो सामान्य बनाएंगे, लेकिन वे तानाशाह ज़िया-उल हक़ से भी चार हाथ आगे निकल गए थे। उन्होंने और उनके पूर्ववर्ती शासकों ने युवाओं के दिमाग में नफरत का जो जहर घोला, आज वही उनकी ओर लौटकर आ रहा है।

यूं तो सत्ता से इमरान की विदाई का मुहूर्त उसी समय निकल गया था, जब उन्होंने सेना से टकराव मोल लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि उनकी सरकार गिर गई। इमरान अब तक जीवित हैं, इसे अपना सौभाग्य समझें। उनके देश में जो भी प्रधानमंत्री/पूर्व प्रधानमंत्री सेना से वैर मोल लेता है, उसे या तो फांसी के फंदे पर लटका दिया जाता है या किसी हमले में उसकी जान ले ली जाती है। 

इमरान पर हुआ यह हमला 27 दिसंबर, 2007 की याद दिलाता है, जब पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो पर कुछ इसी तरह गोलियां चलाई गई थीं। हालांकि बाद में बम धमाका भी हुआ और पाक की प्रथम महिला प्रधानमंत्री रहीं बेनजीर की मौत हो गई। उनके पिता ज़ुल्फ़िक़ार के साथ जो कुछ हुआ, उसे दुनिया देख चुकी है। वैसे पाकिस्तान में प्रधानमंत्रियों की हत्या का सिलसिला उसके अस्तित्व में आने के साथ ही शुरू हो गया था। वहां पहले प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान पर भी इसी तरह गोलीबारी हुई, जिसके बाद वे परलोक सिधार गए थे।

अगर इमरान ख़ान अपने जीवन की सुरक्षा चाहते हैं तो उन्हें सेना और आईएसआई की हां में हां मिलानी होगी। वे यह भलीभांति जानते हैं कि जिसने भी सेना को आंखें दिखाईं, उसके जीवन पर संकट मंडराने लगा। बेनजीर को भी यह 'भ्रम' हो गया था कि वे अपनी लोकप्रियता के बूते सरकार बना लेंगी। इसके लिए परवेज मुशर्रफ से टकराव लिया। सेना ने पूर्व में उनके काफिले पर हमला करवाकर संकेत दिया था कि वे यहीं से लौट जाएं। आखिरकार उन्होंने इसकी भारी कीमत चुकाई। 

इसमें कोई संदेह नहीं कि आज पाकिस्तान में इमरान सर्वाधिक लोकप्रिय राजनेता हैं, इसलिए वे अति-आत्मविश्वास के शिकार हो गए हैं। उन्हें लगता है कि वे अपनी पिछली सरकार गिराए जाने के बदले दोबारा सरकार बनाकर यह दिखा देंगे कि जनता अब भी उन्हें पसंद करती है। इसके लिए वे चुनावों में पूरी ताकत झोंकेंगे। इस हमले के बाद उनके भाषणों में और धार आएगी। वे सेना और आईएसआई प्रमुख को जमकर आड़े हाथों लेंगे, लेकिन इस दौरान उन्हें बहुत सावधान रहना होगा, क्योंकि पाक के 'असल शासक' उन पर भी वही फॉर्मूला अपनाना चाहेंगे, जो वे कई पूर्व प्रधानमंत्रियों पर अपना चुके हैं। 

भारत के लिए भी यह सतर्कता बरतने का समय है। निकट भविष्य में पाकिस्तान में राजनीतिक संघर्ष और तेज होगा। वहां जिस तरह की रक्तरंजित राजनीति का चलन रहा है, उसको ध्यान में रखते हुए भारत को सीमा और नियंत्रण रेखा पर विशेष सावधानी बरतनी होगी। पाकिस्तान अपने अंदरूनी हालात से जनता का ध्यान हटाने के लिए कोई नापाक चाल भी चल सकता है।

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