जारी रहें चुनाव-सुधार

सभी राजनीतिक दलों और नेताओं को अपने देश के चुनाव आयोग और मतदाताओं पर भरोसा होना चाहिए

जारी रहें चुनाव-सुधार

हर विवेकशील मनुष्य यही चाहेगा कि चुनाव प्रक्रिया से जुड़े सुधार होते रहने चाहिएं

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के माध्यम से डाले गए वोट का ‘वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल’ (वीवीपीएटी) के साथ मिलान और दोबारा मतपत्रों से चुनाव कराने की प्रक्रिया अपनाने का अनुरोध करने वाली याचिकाओं के उच्चतम न्यायालय में खारिज होने के बाद अब इस मामले का पटाक्षेप हो जाना चाहिए। न्यायालय ने उचित ही कहा कि 'तंत्र के किसी भी पहलू पर आंख मूंदकर अविश्वास करना बिना वजह संदेह पैदा कर सकता है' और ‘लोकतंत्र का अर्थ सद्भाव और सभी संस्थाओं में भरोसा बनाए रखने का प्रयास करना है।' सभी राजनीतिक दलों और नेताओं को अपने देश के चुनाव आयोग और मतदाताओं पर भरोसा होना चाहिए। इतनी बड़ी आबादी वाले देश में चुनाव करवाना कोई मामूली बात नहीं है। इस पर अरबों रुपए खर्च होते हैं। बहुत समय और श्रम लगता है। हफ्तों की मशक्कत के बाद नई सरकार बनती है। यहां ऐसे सुधारों को अपनाना बहुत जरूरी है, जो विश्वसनीय होने के साथ ही सरल भी हों और उनसे संसाधनों, समय व श्रम की बचत हो। देश में अनेक चुनाव-सुधारों के बाद ईवीएम आई और जनता ने उसे हाथोंहाथ लिया। उच्च शिक्षित से लेकर निरक्षर मतदाता तक, सबके लिए मतदान करने का सबसे सरल माध्यम ईवीएम है। अब मतपत्र लेने, ठप्पा लगाने, मोड़ने, पेटी में डालने की कोई जरूरत नहीं, बस बटन दबाया और मतदान हो गया! आश्चर्य होता है कि कुछ लोग इस पर संदेह जताते हुए उच्चतम न्यायालय चले जाते हैं, लेकिन जब चुनाव आयोग खामी साबित करने के लिए बुलाता है तो नहीं जाते और न ही कोई ऐसा प्रमाण दे पाते हैं, जिससे यह पता चले कि ईवीएम में सचमुच कोई गड़बड़ है!

प्राय: यह सवाल किया जाता है कि जापान, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देश, जो तकनीकी तौर पर इतने विकसित हैं, वे ईवीएम से मतदान क्यों नहीं करवाते? यह ध्यान रखना चाहिए कि इन देशों की आबादी (तुलनात्मक रूप से) बहुत कम है। क्षेत्रफल भी छोटा है। इनमें से किसी भी देश की मतदान प्रक्रिया को भारत के एक राज्य की सरकारी मशीनरी कुछ ही घंटों में करवा सकती है। कुछ लाख/करोड़ मतपत्रों को गिनना (तुलनात्मक रूप से) सरल होता है। वहीं, भारत में इसे लागू कर दिया जाए तो ऐसी कई समस्याएं दोबारा खड़ी हो जाएंगी, जिन्हें हम नब्बे के दशक में छोड़ आए हैं। मतदाताओं को वीवीपीएटी पर्चियां सौंपे जाने, मतगणना के लिए उन्हें मतपेटी में डालने, साथ ही वीवीपीएटी पर्चियों की सौ प्रतिशत गिनती करने की मांग पूरी हो जाती तो चुनाव प्रक्रिया और ज्यादा जटिल हो जाती। उससे फिर नए विवाद पैदा होते। जिन्होंने मतपत्रों से लोकसभा और विधानसभा के चुनाव होते देखे हैं, वे जानते हैं कि उस दौरान मतदान से लेकर मतगणना तक कितनी समस्याएं होती थीं। कई मतपत्र तो इस वजह से ही खारिज हो जाते थे, क्योंकि उन पर ठप्पा 'गलत जगह' लगा होता था। बहुत बार ऐसा होता, जब पक्ष-विपक्ष के लोग इस बात पर भिड़ जाते कि यह वोट हमारे उम्मीदवार को मिला था! कुछ इलाकों में तो बूथ पर कब्जा कर मतपेटियां लूट ली जाती थीं या बाहुबली किस्म के लोग मनचाहे उम्मीदवार के नाम पर ठप्पा लगाकर लोगों से कह देते कि 'हो गया मतदान, अब आप अपने घर जाइए।' क्या देशवासी फिर से उस दौर में जाना पसंद करेंगे? चुनाव प्रक्रिया से जुड़े विवाद (समय के साथ) कम होने चाहिएं या नए-नए विवाद पैदा होने चाहिएं? हर विवेकशील मनुष्य यही चाहेगा कि चुनाव प्रक्रिया से जुड़े सुधार होते रहने चाहिएं और विवाद कम होते-होते खत्म होने चाहिएं। उच्चतम न्यायालय का फैसला भी इसी बात को रेखांकित करता है।

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