ईरान के हालात से सीखें ये सबक

सरकारों को वैज्ञानिक उन्नति पर जोर देना चाहिए

ईरान के हालात से सीखें ये सबक

खामेनेई जून 1989 से ईरान के सर्वोच्च नेता थे

इजराइल व अमेरिका की संयुक्त सैन्य कार्रवाई से ईरान दहल उठा। उसके सर्वोच्च नेता समेत कई वरिष्ठ अधिकारी और आम नागरिक मारे गए। घटना के बाद ईरान ने भी पूरी ताकत से पलटवार किया है। आखिरकार, इन सबका नतीजा क्या होगा, इस पर पूरी दुनिया की निगाहें हैं। ईरान के मौजूदा हालात में दुनिया के लिए बहुत बड़े सबक हैं। इनसे पहला सबक यह लिया जा सकता है कि जब कोई देश वैज्ञानिक उन्नति में पीछे रह जाता है और अंदर से कमजोर होता है तो दुश्मन का हौसला बढ़ जाता है। सरकारों को वैज्ञानिक उन्नति पर जोर देना चाहिए। ईरान के पास तेल-गैस के भंडार हैं। वह इन पर बहुत निर्भर रहा। उसने अन्य क्षेत्रों की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। जब अमेरिका समेत पश्चिमी देशों ने उस पर प्रतिबंध लगाए तो अर्थव्यवस्था चरमराने लगी। सरकारों को चाहिए कि वे एक ही क्षेत्र के भरोसे न रहें। अन्य क्षेत्रों का भी विकास करें। राष्ट्रीय सुरक्षा बहुत गंभीर विषय है। देश की दशा और दिशा इस पर निर्भर करती हैं। शीर्ष नेताओं की सुरक्षा का सख्ती से मूल्यांकन करना चाहिए। अगर वे ही सुरक्षित नहीं रहेंगे तो देश कैसे सुरक्षित रहेगा? उनकी सुरक्षा में तैनात कुछ अधिकारी यह सोचकर जोखिम को कम आंकते हैं कि 'अब तक कुछ नहीं हुआ तो आगे भी कुछ नहीं होगा।' उन्हें याद रखना चाहिए कि दुश्मन को सिर्फ एक मौके की तलाश होती है। ईरान में मोसाद और सीआईए का जाल फैला हुआ है। इनके एजेंट सरहद पार गुप्त सूचनाएं भेजते रहते हैं। किसी भी देश को इस मामले में बहुत सतर्क रहना चाहिए। दुश्मन एजेंसियों को अपनी जमीन पर किसी सूरत में न पनपने दें।

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अपनी सुरक्षा के लिए अन्य देशों और संगठनों के भरोसे बिल्कुल नहीं रहना चाहिए। जब दुश्मन नुकसान पहुंचा देता है तो दुनिया सिर्फ कड़ी निंदा करती है। खामेनेई के मामले में यही हो रहा है। इससे पहले, जब अमेरिकी सेना वेनेजुएला से निकोलस मादुरो को उठा ले गई तो दुनिया कड़ी निंदा करती रह गई। जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तब भी कड़ी निंदा खूब हुई। अक्लमंद लोग अपने देश की सुरक्षा खुद करते हैं। वे हर चुनौती का सामना करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। खामेनेई जून 1989 से ईरान के सर्वोच्च नेता थे। ऐसे आरोप हैं कि उन्होंने अपने खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों का निर्ममता से दमन किया था। याद करें, महसा अमीनी के साथ क्या हुआ था? उन हजारों महिलाओं के साथ कैसा सलूक किया गया था, जो महसा अमीनी के लिए इन्साफ की मांग कर रही थीं? जब कोई शासक अपने ही लोगों को इस तरह कुचलता है तो मामला बिगड़ता है। उसका फायदा कोई और उठाता है। हाल में ईरानी मुद्रा के भारी पतन के बाद विरोध प्रदर्शन कर रहे हजारों लोग मौत के घाट उतार दिए गए। क्या उनके परिजन खामोश बैठे रहे? क्या मोसाद और सीआईए जैसी एजेंसियों ने उन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश नहीं की होगी? अगर भविष्य में असंतोष भड़का तो वे किसका साथ देंगे? इन सवालों के जवाब ढूंढ़ना मुश्किल काम नहीं है। अगर कोई सरकार रोटी नहीं दे सकती, तो वह कम-से-कम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो दे। कोई शासक अपने देशवासियों पर गोलियां चलाकर, उनकी आवाज दबाकर अपनी कुर्सी बचा सकता है, लेकिन कई चीजें गंवा बैठता है। इस स्थिति को टालने का सबसे अच्छा उपाय है- लोगों की आवाज सुनें, जहां तक संभव हो बातचीत से ही समाधान निकालें, 'सही समय' पर किसी योग्य व्यक्ति को आगे लाएं और उसके लिए कुर्सी छोड़ दें।

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