पाकिस्तान: मध्यस्थ या मोहरा?

समझौते के बावजूद हमले नहीं रुके तो ईरान भड़क सकता है

पाकिस्तान: मध्यस्थ या मोहरा?

अमेरिकी राष्ट्रपति का मिजाज मौसम की तरह पलट रहा है

अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच युद्धविराम में पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता को भारत की विदेश नीति के लिए झटका बताया जा रहा है! विपक्ष के कुछ नेताओं ने यह साबित करने में पूरी ऊर्जा लगा दी है कि पाकिस्तान को मौका मिलने से भारत की विदेश नीति फेल हो गई है। हालांकि वे इसका दूसरा पहलू नहीं देख रहे हैं। अभी सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि दोनों पक्षों में कोई समझौता हो पाएगा या नहीं? कागजों पर हस्ताक्षर ही होंगे या धरातल पर उसका असर दिखाई देगा? ट्रंप ने जब से युद्धविराम संबंधी घोषणा की है, उस पर संदेह के बादल मंडरा रहे हैं। ईरान में धमाके पूरी तरह रुके नहीं हैं। वह भी मौका देखकर धावा बोल रहा है। उधर, इज़राइल हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर बम बरसा रहा है। लेबनान सुलग रहा है। जब कोई समझौता होने से पहले ऐसी तस्वीर है तो इसका भविष्य क्या होगा? अभी, ईरान और इज़राइल के मीडिया में क्या चल रहा है? दोनों तरफ के नेता आस्तीनें चढ़ा रहे हैं। अगर ऐसे माहौल में कोई समझौता हो गया तो वह कितने दिन टिकेगा? ट्रंप ने पाकिस्तान को बहुत सोच-समझकर बीच में लिया है। उसके प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख उनकी कोई बात टाल नहीं सकते। जैसे ही समझौते की शर्तों पर हस्ताक्षर होंगे, ट्रंप नोबेल शांति पुरस्कार पर दावेदारी जताने के लिए अपने पक्ष में माहौल बनाना शुरू कर देंगे। वे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख के मुंह से भी यह कहलवाएंगे कि 'ट्रंप बहुत बड़े शांति पुरुष हैं'। भले ही समझौते के बाद अमेरिका-इज़राइल दोबारा ईरान के साथ गुत्थमगुत्था हो जाएं। पाकिस्तान एक अगंभीर देश है। उसके शब्दों पर किसी को विश्वास नहीं है। ट्रंप को भी नहीं है। कहीं वे उसे बलि का बकरा तो नहीं बना रहे हैं? अगर समझौते के बावजूद हमले नहीं रुके तो ईरान भड़क सकता है। वह अपनी मिसाइलों का रुख पाकिस्तान की ओर कर सकता है। जनवरी 2024 में इन दोनों देशों के बीच टकराव हो चुका है।

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वास्तव में ट्रंप पाकिस्तान को अपने फायदे के लिए मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। अगर कल वे उसी पर सारा दोष डाल दें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अमेरिकी राष्ट्रपति का मिजाज मौसम की तरह पलट रहा है। उनके बयानों में भारी विरोधाभास है। अच्छा है कि वे पाकिस्तान के कंधे पर रखकर बंदूक चलाएं और पाकिस्तानी हुक्मरान उनकी जय-जयकार करें। भारत को ऐसे समझौते के लिए मध्यस्थ बनना भी नहीं चाहिए, जिसके सफल होने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है। यह समझौता न तो ईरानी नेतृत्व की जिद पर लगाम लगा पाएगा, न ट्रंप के बेतुके फरमानों पर विराम लगा पाएगा। शांति के लिए दोनों ही पक्षों में ईमानदारी का घोर अभाव है। सोचिए, अगर पाकिस्तान के बजाय भारत इस समझौते में मध्यस्थ बनता तो क्या होता? उस स्थिति में विपक्ष के नेता यह कहकर केंद्र सरकार की तीखी आलोचना करते कि 'पराई पंचायती में कूदने की क्या जरूरत थी? ... क्या आपको इस समझौते का भविष्य नहीं मालूम था? ... क्या आपको ट्रंप के बड़बोलेपन की जानकारी नहीं थी?' उस स्थिति में ईरान के साथ भारत के संबंध खराब होते। इज़राइल के साथ भी रिश्ते बिगड़ते। तब विपक्ष यह कहकर केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेता, 'करवा दी शांति? ... बन गए विश्वगुरु? ... मध्यस्थता के चक्कर में करवा ली किरकिरी? ... क्या जरूरत थी ऐसा करने की? ... क्या अपने देश में समस्याओं की कमी है? ... महंगाई, बेरोजगारी, किसानों के मुद्दे ... कितनी समस्याएं हैं! ... अपने देश की परवाह नहीं है, अपने झगड़े मिटते नहीं हैं, दुनिया में शांति करवाने चले हैं!' जिस समझौते की नींव बिल्कुल खोखली हो, उसमें मध्यस्थता पाकिस्तान को मुबारक हो!

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