बोरसर ने दिखाया सुधार का रास्ता

इस गांव ने अपशब्दों पर प्रतिबंध लगाया

बोरसर ने दिखाया सुधार का रास्ता

अपशब्द बोलने से कोई निडर नहीं हो जाता

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के बोरसर गांव ने अपशब्दों पर प्रतिबंध लगाकर सराहनीय पहल की है। जो व्यक्ति इस गांव में अपशब्द बोलता पाया जाएगा, उसे या तो 500 रुपए का जुर्माना अदा करना होगा या एक घंटे तक गांव की सफाई करनी होगी। देश में अपशब्दों का प्रयोग एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। कई लोगों में इतनी खराब आदत होती है कि वे बच्चों के सामने अभद्र शब्द बोलते हैं। ऐसे खुराफाती भी होते हैं, जो छोटे बच्चों को चुपके-से अपशब्द सिखा देते हैं। इसके बाद जब बच्चे तुतलाती बोली में इन शब्दों को दोहराते हैं तो वे ठहाके लगाते हैं। क्या यह कोई मनोरंजन का विषय है? छोटे बच्चों को ऐसी बुरी बातें सिखाने से उनके मन पर कितना नकारात्मक असर पड़ सकता है? प्राय: ऐसे लोगों को लगता है कि अगर वे अपशब्द बोलेंगे तो 'बड़े, निडर और साहसी' कहलाएंगे! इसका बड़प्पन से कोई संबंध नहीं है। अपशब्द बोलने से कोई निडर नहीं हो जाता। साहस एक सद्गुण है। इसे दुर्गुण से न मिलाया जाए। इस आदत को कई वेब सीरीजों ने बहुत बढ़ावा दिया है। उनके संवादों में जानबूझकर अपशब्द डाले जाते हैं। ऐसा माहौल बना दिया गया है कि पूरा परिवार एकसाथ बैठकर कोई सीरीज नहीं देख सकता। कहीं यह भारतीय परिवारों को तोड़ने की कोई साजिश तो नहीं है? ऐसे कई मामले आ चुके हैं, जब बच्चों ने कोई वेब सीरीज देखी और उसमें बोले गए अपशब्दों का प्रयोग स्कूल में अपने साथियों के सामने किया। इस तरह ये शब्द बहुत तेजी से फैलते हैं। अभिभावकों को आश्चर्य होता है कि बच्चे ऐसे शब्द कैसे बोल रहे हैं! वहीं, बच्चों को लगता है कि अगर अपशब्द बोलेंगे तो इसका मतलब है कि हम बड़े हो गए, क्योंकि टीवी में बड़े लोगों को ऐसा बोलते सुना था!

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जो वेब सीरीज, फिल्में, धारावाहिक, गाने आदि अपशब्दों के जरिए समाज को प्रदूषित करें, उनके निर्माताओं, निर्देशकों, लेखकों, अभिनेताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। हाल में दो ऐसे गाने बहुत चर्चा में रहे थे, जिनके शब्द अत्यधिक अशालीन थे। लोगों ने उनका बहुत विरोध किया था। यह एक अच्छी शुरुआत है। ऐसी ओछी हरकतों का विरोध होना ही चाहिए। अश्लील, अभद्र और अशालीन शब्द बोलना सामान्य व्यवहार का हिस्सा नहीं है। यह मानसिक विकृति का परिचायक है। जो व्यक्ति ऐसा करे, उसे हतोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके अलावा भी कई बुराइयां हैं, जिनका उन्मूलन करने के लिए बोरसर गांव की तर्ज पर कोशिशों की जरूरत है। उदाहरण के लिए- कई लोग गुटखा, खैनी, पान आदि खाकर इधर-उधर थूकते रहते हैं। कई सार्वजनिक स्थानों की दीवारें पीक से रंगी पड़ी हैं। न जाने लोगों को इसमें क्या आनंद आता है! अगर किसी जगह को सुधार नहीं सकते, तो बिगाड़ते क्यों हैं? इन लोगों की आदत में सुधार लाने के लिए जुर्माना लगाया जाए। साथ ही, उस जगह की सफाई भी कराई जाए। उस जगह पर सीसीटीवी कैमरे लगाकर कड़ी नजर रखी जाए। जो व्यक्ति वहां थूके, उसका वीडियो सोशल मीडिया पर डाला जाए। इसी तरह कई लोग अपने घर का कूड़ा-कचरा बाहर फेंकते हैं। उस पर मक्खी-मच्छर मंडराते हैं और बीमारियां फैलाते हैं। बहुत लोग सुबह कचरा जलाते हैं। उन्हें लगता है कि इससे सफाई होती है, जबकि पर्यावरण को भारी नुकसान होता है। जब कोई व्यक्ति उन्हें समझाने की कोशिश करता है तो वे झगड़ा करने लगते हैं। प्राय: सब्जी मंडियों में कचरे के ढेर का इसी तरह निपटारा किया जाता है। अगर लोग थोड़ी-सी बुद्धि लगाएं तो इस कचरे से रसोईघर के लिए गैस और खेत के लिए खाद बना सकते हैं। सकारात्मक बदलाव लाने के लिए इतनी इच्छाशक्ति सब में होनी चाहिए।

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