सुविधाओं के शत्रु

ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए

सुविधाओं के शत्रु

वे व्यवस्था बिगाड़ने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं

रेलवे के कई यात्रियों द्वारा पिछले कुछ वर्षों में एसी कोच से करोड़ों रुपए की चद्दर, कंबल, तकिया कवर आदि पार करने की घटनाएं शर्मनाक हैं। इन कोचों में यात्रा करने वाले लोगों के बारे में यह तर्क भी नहीं दिया जा सकता कि वे दैनिक जीवन में आर्थिक तंगी और चीजों की किल्लत के कारण ऐसा कर रहे हैं। रेलवे की संपत्ति यात्रियों की सुविधा के लिए है। कई यात्री इसे अपनी निजी संपत्ति समझकर हाथ साफ कर रहे हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। जो व्यक्ति ऐसा करता पाया जाए, उससे संबंधित सामान की कीमत का कई गुणा जुर्माना वसूला जाए। रेलवे में उक्त चीजों की चोरी की घटनाओं से पता चलता है कि कई लोग अपनी आदत से मजबूर हैं। ये जहां भी जाते हैं, अपना 'हुनर' दिखाते हैं। किसी जगह की सुंदरता को कैसे नष्ट करना है, साफ जगह पर कैसे गंदगी फैलानी है, कहीं पर व्यवस्था कैसे बिगाड़नी है - इन सब कार्यों में उन्हें महारत हासिल होती है। पिछले साल सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें कुछ बाराती अपने घर लौटते वक्त कन्या पक्ष द्वारा किए गए इंतजाम को तहस-नहस करते दिखाई दे रहे थे। उन्होंने चद्दर, गद्दे, तकिए आदि को मिलकर फाड़ दिया था। अगर इतनी एकता और बल का प्रदर्शन किसी सकारात्मक काम में करते तो मानवता की बहुत बड़ी सेवा होती। जो लोग ऐसी मानसिकता रखते हैं, उन्हें दूसरों की परवाह नहीं होती है। वे व्यवस्था बिगाड़ने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं।

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भारत में अक्सर लोग शिकायतें करते हैं कि 'सरकार हमारे लिए सुविधाओं का निर्माण नहीं करती है ... उसे सार्वजनिक स्थानों की सुंदरता एवं स्वच्छता की परवाह नहीं है।' ये शिकायतें पूरी तरह निराधार नहीं हैं। कई जगह सरकारी प्रयासों में कमियां रहती हैं, लेकिन हर कमी के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। जो लोग एसी कोच से चद्दर, कंबल, तकिया कवर उड़ा रहे हैं, क्या उन्हें सरकार ने ऐसा करने के लिए कहा है? व्यवस्था बिगाड़ने में लोगों के किरदार को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। राजस्थान के जयपुर शहर में सुंदर एवं कई सुविधाओं से युक्त नई बसें चली थीं। लोगों ने एक महीने में ही उनकी सूरत बिगाड़ दी। कहीं गुटखा-पान खाकर थूक दिया, किसी सीट को उधेड़ दिया, कहीं आपत्तिजनक शब्द लिख दिए - ये नजारे विभिन्न शहरों की बसों में आसानी से देखने को मिल जाएंगे। विद्यार्थी जीवन से ही इसकी शुरुआत हो जाती है। बच्चों को इस बात की शिक्षा देनी चाहिए कि हमें सार्वजनिक स्थानों एवं संसाधनों की सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए। हम ऐसा कोई काम न करें, जिससे इनकी गुणवत्ता और अस्तित्व पर आंच आए। कुछ साल पहले एक स्कूल के बच्चे, जो बड़ी कक्षाओं से थे, राजस्थान के एक शहर में टेबल टेनिस का मैच खेलने गए। वहां उन्हें एक धर्मशाला में ठहराया गया। विद्यार्थियों ने मैच जीतने के लिए पूरा जोर लगाया, लेकिन अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके। वे हारकर धर्मशाला लौट आए। अचानक एक लड़के को खुराफात सूझी। उसने अपने साथियों को सुझाव दिया कि 'हम मैच हार गए, कोई बात नहीं ... अब इस धर्मशाला के कमरों में लगे बल्ब उतारकर ले चलते हैं।' उन लड़कों को हार की मायूसी सता रही थी। उन्हें ऐसी खुराफात में आनंद का स्रोत नजर आया। उन्होंने योजना के अनुसार कई कमरों के बल्ब उतार लिए। जब वे अपने गांव रवाना हुए तो धर्मशाला के प्रबंधक ने सबको रोक लिया। उसने भारी जुर्माना वसूला और स्कूल को सूचित कर दिया। इस घटना से उनकी बहुत किरकिरी हुई। वास्तव में, ऐसे लोगों को चोरी करने, व्यवस्था बिगाड़ने, किसी जगह की सुंदरता नष्ट करने में आनंद का स्रोत नज़र आता है। जिस दिन उन्हें अहसास हो जाएगा कि 'गलत हरकतें महंगी पड़ेंगी', वे इनसे तौबा कर लेंगे।

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