भारतीय ट्रेनों के हाइड्रोजन युग का आगाज
यह सफर भविष्य में हजारों किमी के दरवाजे खोलेगा
समय के साथ यह ट्रेन और उन्नत होती जाएगी
भारत ने पहली बार हाइड्रोजन से ट्रेन चलाकर इतिहास रच दिया। हरियाणा में जींद से सोनीपत के बीच चलने वाली यह ट्रेन स्वदेशी तकनीक का एक और श्रेष्ठ उदाहरण है। अब तक अमेरिका, जर्मनी, चीन, जापान जैसे देशों के पास ही इसकी तकनीक थी। फ्रांस और इटली में भी हाइड्रोजन ट्रेनों की परियोजनाएं चल रही हैं, लेकिन वहां इनका परिचालन बहुत सीमित है। उनके संदर्भ में, परीक्षण चरण कहा जाए तो गलत नहीं होगा। ये देश बहुत साधन-संपन्न और विकसित माने जाते हैं। भारत ने अपने दम पर हाइड्रोजन ट्रेन चलाकर वह मुकाम हासिल किया है, जिसे असंभव माना जाता था। यह ट्रेन लोगों को अपने गंतव्य तक पहुंचाने के साथ ही भारत की तरक्की को नई रफ्तार देगी। कई लोग भारत के ज्ञान-विज्ञान को निशाना बनाने और अंग्रेजों को सर्वशक्तिमान एवं बहुत बड़ा सुधारक साबित करने के लिए कहते हैं कि 'ब्रिटेन की वजह से यहां ट्रेन चली थी, अन्यथा लोग आज भी बैलगाड़ी से सफर करते।' उन्हें आंखें खोलकर अच्छी तरह देख लेना चाहिए कि भारत के वैज्ञानिक किसी से कम नहीं हैं। हमारे वैज्ञानिकों ने अपनी बुद्धि और प्रतिभा से हाइड्रोजन ट्रेन के संचालन को संभव कर दिखाया है। यह सिर्फ रेलवे के इतिहास की नहीं, बल्कि 21वीं सदी की बहुत बड़ी घटना है। जींद से सोनीपत के बीच लगभग 90 किमी का यह सफर भविष्य में हजारों किमी के दरवाजे खोलेगा। समय के साथ यह ट्रेन और उन्नत होती जाएगी। ट्रेन की शक्ति व सामर्थ्य में निश्चित रूप से बढ़ोतरी होगी। वहीं, लागत में कमी लाने के लिए नए तौर-तरीके ढूंढ़े जाएंगे। इसका फायदा देश के करोड़ों नागरिकों को होगा।
भारत की यह ट्रेन अपनी ताकत के मामले में इस श्रेणी की अन्य ट्रेनों से बहुत आगे है। बत्तीस सौ हॉर्स पावर के साथ ट्रेन चलाना कोई मामूली बात नहीं है। जिन विकसित देशों में हाइड्रोजन ट्रेनें चल रही हैं, उनके साथ तीन-चार कोच ही जुड़े होते हैं। वहीं, भारत ने इसके साथ 10 कोच जोड़कर पटरियों पर उतार दिए। अगर इंजन क्षमता और कोचों की संख्या देखें तो विकसित देशों की हाइड्रोजन ट्रेनें भारतीय ट्रेन के सामने खिलौना हैं! यह ट्रेन स्वच्छ ईंधन की दिशा में एक मिसाल बन सकती है, क्योंकि इससे धुआं नहीं निकलेगा। चूंकि यह हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक पर आधारित है, जो हाइड्रोजन को बिजली में बदल देगी, इसलिए स्वच्छ और टिकाऊ परिवहन व्यवस्था का पर्याय बनेगी। अगले 10 वर्षों में इसके जरिए जो बदलाव आएंगे, उन्हें देखकर दुनिया हैरान रह जाएगी। इन ट्रेनों से माल ढुलाई की लागत को घटाया जा सकता है। इससे कीमतों पर दबाव कम होगा। ग्राहकों को महंगाई से कुछ राहत मिलेगी। स्वदेशी तकनीक के साथ कई फायदे जुड़े होते हैं। हाइड्रोजन ट्रेन से देश को ईंधन सुरक्षा मिलेगी। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने इसकी अहमियत बता दी है। भारतीय ट्रेनें 'डीजल युग' से निकलकर 'विद्युत युग' में प्रवेश कर गई थीं, इसलिए इनकी रफ्तार नहीं रुकी। अब 'हाइड्रोजन युग' भारतीय ट्रेनों को ईंधन के मामले में और ज्यादा सक्षम एवं सुरक्षित बना देगा। सौ साल पहले रेलवे के विद्युतीकरण की शुरुआत हो गई थी, लेकिन भारत में इसकी रफ्तार कम रही। यह जानकर आश्चर्य होता है कि साल 2014 तक पूरे देश में रेल नेटवर्क के सिर्फ 30 प्रतिशत हिस्से का ही विद्युतीकरण हुआ था! नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस काम में तेजी आई। अब यह आंकड़ा लगभग 99 प्रतिशत तक पहुंच गया है। देश को इससे और आगे बढ़ने की जरूरत है। हाइड्रोजन ट्रेनों का हर मार्ग पर विस्तार होना चाहिए।

