चढ़ावा प्रबंधन में पारदर्शिता समय की मांग

खूंखार आक्रांता भी हमारी आस्था नहीं डिगा सके थे

चढ़ावा प्रबंधन में पारदर्शिता समय की मांग

ये मुट्ठीभर भ्रष्टाचारी क्या कर लेंगे?

जब से अयोध्या स्थित श्रीराम मंदिर के चढ़ावे में कथित हेराफेरी का मामला सामने आया है, ऐसे लोग भी भक्ति संबंधी विषयों पर उपदेश देने लगे हैं, जो कल तक मंदिर का विरोध कर रहे थे। उन्हें मंदिरों के प्रबंधन में पारदर्शिता को लेकर बड़ी चिंता सताने लगी है। जो कभी यह कहकर हिंदुओं की आस्था पर चोट करते थे कि 'मंदिर बनाने से क्या मिल जाएगा? ... अगर बनाना ही है तो वहां कोई अस्पताल बना दें', वे आज बड़े-बड़े भाषण देकर चढ़ावे पर चर्चा कर रहे हैं। हालांकि वे अब भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर उनकी मंडली यह कहकर हिंदू आस्था का मजाक उड़ा रही है कि मंदिरों में चढ़ावे की जगह किसी अन्य काम में अपना धन खर्च कर दें। क्या वे खुद कभी मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाते हैं? क्या वे परोपकार संबंधी गतिविधियों में अपना धन खर्च करते हैं? अगर ये सवाल उनसे पूछे जाएं तो वे चुप्पी साध लेंगे। श्रीराम मंदिर चढ़ावा मामले में आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई हुई है। विशेष जांच दल अपनी जांच में जुटा है। जो भी दोषी होगा, उसका पर्दाफाश किया जाएगा। उसे कठोर दंड मिलेगा। ऐसे मामले गंभीर चिंता और दु:ख का विषय हैं। जब कोई श्रद्धालु यह सुनता है कि मंदिर के चढ़ावे में हेराफेरी हुई है तो उसे बहुत पीड़ा होती है, लेकिन यह कहना पूरी तरह गलत है कि इससे लोगों की आस्था कम हुई है या कम हो जाएगी। अतीत में हमारे देश पर विदेशी आक्रांताओं ने कई हमले किए थे। उन्होंने अनेक मंदिरों और प्रतिमाओं को खंडित किया था। खूब लूट मचाई थी। क्या उससे हमारी आस्था कम हुई? कभी नहीं, बल्कि लोगों ने पिछली घटनाओं से सबक लेकर मंदिर निर्माण एवं उनके प्रबंधन में और ज्यादा आस्था दिखाई। जब खूंखार आक्रांता हमारी आस्था नहीं डिगा सके तो ये मुट्ठीभर भ्रष्टाचारी क्या कर लेंगे? ये तो खुद कानून के शिकंजे में हैं।  

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श्रीराम मंदिर में चढ़ावे का उक्त मामला सामने आने के बाद हर मंदिर के चढ़ावे के रखरखाव और प्रबंधन में पारदर्शिता के लिए आवाज उठ रही है। इसका स्वागत होना चाहिए। मंदिरों में श्रद्धालु सबसे ज्यादा नकदी और प्रसाद चढ़ाते हैं। प्रसाद के संबंध में मंदिरों के नियम अलग-अलग हैं। वह श्रद्धालुओं में वितरित कर दिया जाता है। इसमें किसी को आपत्ति नहीं है। असल मुद्दा नकदी की सुरक्षा का है। इसका सही ढंग से रखरखाव और प्रबंधन कोई मुश्किल काम नहीं है। आज हर श्रद्धालु के हाथ में स्मार्टफोन है। उसका बैंक खाता है। उसके लिए डिजिटल पेमेंट कोई नई बात नहीं है। अगर मंदिरों में चढ़ावे का ज्यादातर हिस्सा डिजिटल हो जाए तो उसे गिनने की समस्या ही नहीं रहेगी। मंदिर परिसर और प्रबंधन समिति के कार्यालयों में क्यूआर कोड लगाए जा सकते हैं। इसके बाद जो श्रद्धालु चढ़ावा अर्पित करना चाहता है, वह अपने बैंक खाते से सीधे भेज सकता है। इस तरह पूरी पारदर्शिता रहेगी। कुल धनराशि का साल में एक बार ऑडिट करवाकर पूरा हिसाब-किताब ऑनलाइन प्रस्तुत कर दिया जाए, जिससे हर व्यक्ति की उस तक पहुंच हो। एक साल में कितना चढ़ावा आया, वह कहां खर्च हुआ, मंदिर के विकास और श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं जुटाने में कितने रुपए लगे - इन सबका विवरण मिलने से अनावश्यक आशंकाएं पैदा नहीं होंगी। जो श्रद्धालु डिजिटल पेमेंट करना नहीं जानते, उनके लिए नकदी का विकल्प खुला होना चाहिए। उस धनराशि की सुरक्षा के लिए कड़े इंतजाम किए जाएं। वहां सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं। एक भी कैमरा खराब हो तो उसे तुरंत बदला जाए। उस दौरान वहां नकदी की गिनती न हो। पुजारी हो या कर्मचारी, सबकी वेशभूषा ऐसी होनी चाहिए, जिससे श्रद्धालुओं में विश्वास पैदा हो। हाल में कुछ मंदिरों में पुजारियों और कर्मचारियों पर जेब युक्त कपड़े न पहनने का नियम लागू किया गया है। अगर सभी मंदिरों में ऐसी पहल की जाए तो किसी को अंगुली उठाने का मौका ही नहीं मिलेगा।

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