भोजशाला परिसर देवी सरस्वती का मंदिर है: उच्च न्यायालय
परिसर में नमाज़ पर एएसआई का आदेश रद्द हुआ
हिंदू पक्ष की बड़ी जीत
इंदौर/दक्षिण भारत। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को घोषणा की कि धार ज़िले में स्थित भोजशाला परिसर देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर है और केंद्र तथा एएसआई इसके प्रशासन एवं प्रबंधन पर निर्णय ले सकते हैं।
उच्च न्यायालय की इंदौर बेंच, जो इस मामले की सुनवाई कर रही थी, ने यह भी कहा कि मुस्लिम समुदाय, जो 11वीं सदी के इस स्मारक को 'कमाल मौला मस्जिद' कहता है, जिले में मस्जिद के निर्माण के लिए अलग ज़मीन के आवंटन के लिए राज्य सरकार से संपर्क कर सकता है।भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर विवाद पर अपने बहुप्रतीक्षित फैसले में, न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि भोजशाला में संस्कृत शिक्षण केंद्र और देवी सरस्वती के मंदिर के अस्तित्व के संकेत मिले हैं।
न्यायालय ने कहा कि भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद के विवादित परिसर का धार्मिक स्वरूप यह दर्शाता है कि यह देवी सरस्वती का मंदिर है।
यदि मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी धार जिले में मस्जिद बनाने के लिए ज़मीन आवंटन के वास्ते आवेदन करती है, तो राज्य सरकार इस पर विचार कर सकती है।
न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के सन् 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत मुसलमानों को भोजशाला परिसर में शुक्रवार की नमाज़ अदा करने की अनुमति दी गई थी।
न्यायालय के फ़ैसले से पहले, परिसर के अंदर और आस-पास लगभग 1,200 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था।
धार कलेक्टर राजीव रंजन मीणा ने सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक सामग्री फैलाने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी है। प्रशासन ने उस स्थान पर बैरिकेड लगा दिए हैं जहां शुक्रवार की नमाज़ और अदालत का फ़ैसला एक ही समय पर पड़ रहे थे।
यह लंबे समय से चला आ रहा विवाद धार ज़िले में एएसआई-संरक्षित स्मारक की धार्मिक प्रकृति से संबंधित है।
हिंदू समुदाय भोजशाला को वाग्देवी (देवी सरस्वती) को समर्पित एक मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद कहता है। जैन समुदाय के एक याचिकाकर्ता का दावा है कि यह परिसर मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल है।
भोजशाला परिसर को लेकर विवाद छिड़ने के बाद, एएसआई ने 7 अप्रैल, 2003 को एक आदेश जारी किया, जिसमें हिंदुओं को हर मंगलवार को परिसर में पूजा करने और मुसलमानों को हर शुक्रवार को वहां नमाज़ अदा करने की अनुमति दी गई। हिंदू पक्ष ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी और परिसर में पूजा करने के विशेष अधिकार की मांग की।
उच्च न्यायालय की इंदौर बेंच के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीज़न बेंच ने इस साल 6 अप्रैल को इस मामले से जुड़ीं पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर नियमित सुनवाई शुरू की।
अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं, ऐतिहासिक दावों, जटिल कानूनी प्रावधानों और विवादित स्मारक से जुड़े हज़ारों दस्तावेज़ों की पृष्ठभूमि में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, न्यायालय ने 12 मई को अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था।


