शिकायत से नहीं, मितव्ययता से पार होगी चुनौती
बहादुर कौमें हालात से जूझना जानती हैं
हमें विदेशी मुद्रा बचानी है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से किए गए मितव्ययता संबंधी आह्वान के बाद कुछ लोग अफवाहें फैलाकर नागरिकों का मनोबल तोड़ने का काम कर रहे हैं। कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर कह रहा है- 'लॉकडाउन लगने वाला है', तो कोई शिकायत कर रहा है- 'समय रहते तेल का पर्याप्त भंडारण क्यों नहीं किया गया?' हमारे देश में एक वर्ग ऐसा है जो जरा-सा चुनौतीपूर्ण समय आते ही शिकायतों की बहुत लंबी सूची निकाल लेता है। ये लोग जिम्मेदार नागरिक के तौर पर कर्तव्य निभाने के बजाय शिकायतें करने का काम पूरी ऊर्जा से करते हैं। क्या भारत के पास तेल के बड़े-बड़े कुएं हैं? देश ने अपनी जरूरतों के लिए तेल का भंडारण किया था, जिसकी वजह से कीमतें अब तक काबू में हैं। ध्यान रखें, इतने बड़े देश के लिए तेल का हर भंडारण कम ही पड़ता। प्रधानमंत्री को एक दिन मितव्ययता अपनाने का आह्वान करना ही पड़ता। लॉकडाउन लगाने संबंधी कयास बिल्कुल निराधार हैं। क्या कोई महामारी आ गई है कि कोरोना काल की तरह लॉकडाउन लगाना पड़ेगा? मुद्दा यह है कि पश्चिम एशिया में हालात तनावपूर्ण हैं। वहां निकट भविष्य में क्या होगा, इस बारे में कोई कुछ नहीं कह सकता। हो सकता है कि जल्द ही शांति समझौता हो जाए या जंग दोबारा भड़क उठे। अगर देर-सबेर शांति समझौता हो भी गया तो वह कितने दिन टिकेगा? इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता। हमें हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। कुछ लोग चाहते हैं कि उनके जीवन में कोई समस्या न आए। वे बटन दबाएं तो कमरे में रोशनी हो जाए, बटन दबाएं तो एसी चल जाए, थाली में रोजाना आठ तरह के पकवान परोसे जाएं और थोड़ी दूर भी जाना हो तो कार तैयार मिले।
वे संघर्ष से दूर भागते हैं। अगर एक रात किसी तकनीकी खराबी की वजह से बिजली न आए तो वे अंधेरे में बैठकर व्यवस्था को कोसते रहेंगे। उन्होंने अंधेरे का सामना करने के बारे में कभी सोचा ही नहीं था। अगर किसी दिन थाली में सिर्फ दाल-रोटी हो तो वे हंगामा खड़ा कर सकते हैं। वे पैदल चलने को अपनी तौहीन समझते हैं। उन्हें सबकुछ वही चाहिए, जो पसंद है। बहादुर कौमें हालात से जूझना जानती हैं। वे अंधेरे से लड़ने के लिए हमेशा तैयार रहती हैं। इस समय देश पर न तो स्वास्थ्य संबंधी कोई संकट है, न कोई आर्थिक संकट है। बात सिर्फ इतनी है कि हर नागरिक यह ध्यान रखे कि हमें विदेशी मुद्रा बचानी है, इसलिए ईंधन की अनावश्यक खपत न करें। अभी सोना नहीं खरीदने, वर्क फ्रॉम होम को प्राथमिकता देने, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने, खाने में तेल कम डालने, खेतों में रासायनिक उर्वरक कम डालने, स्वदेशी को बढ़ावा देने और खास जरूरत न हो तो विदेश यात्रा नहीं करने के आह्वान के पीछे यही मकसद है कि विदेशी मुद्रा की बचत हो। हमें बचपन में बचत करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। यह एक अच्छी आदत है। जिस घर में लोग बचत करना जानते हैं, वह चुनौतीपूर्ण समय को बड़ी आसानी से पार कर लेता है। पहले, गांवों में जब कुएं की मोटर खराब हो जाती थी, तब घर के बड़े-बुजुर्ग समझाते थे कि 'पानी व्यर्थ नहीं बहाना है, जितनी जरूरत है, उतना ही उपयोग करना है।' ऐसा कहना कोई गलत बात नहीं थी। इससे घर के सदस्यों में पानी को लेकर अनुशासन रहता था। जिन कार्यों में पानी की ज्यादा खपत होती थी, जैसे- फर्श, वाहन और ऊनी कपड़े धोने, आंगन में छिड़काव करने, बगीचे में पानी देने आदि, उस दिन नहीं होते थे। अगले दिन जब कुएं की मोटर ठीक हो जाती थी, तब सारे कामकाज सामान्य ढंग से होने लगते थे। बस, इस समय हमें ऐसा ही अनुशासन रखना है। प्रधानमंत्री ने यह नहीं कहा है कि ईंधन बचाने की कोशिश में 'रोटी न खाएं या ऊंट पर बैठकर दफ्तर जाएं।' अगर सभी लोग कुछ दिनों के लिए मितव्ययता का पालन करेंगे तो चुनौतीपूर्ण समय बहुत आसानी से बीत जाएगा।

