दुश्मन के हाथ मजबूत कर रहे ये बयान
वरिष्ठ राजनेता को सोच-समझकर बयान देना चाहिए
पंजाब ने आतंकवाद का दर्दनाक दौर देखा है
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने राज्य में हुए दो धमाकों के बारे में जो बयान दिया, वह एक वरिष्ठ राजनेता को शोभा नहीं देता है। खासकर, एक मुख्यमंत्री को ऐसा बयान बिल्कुल नहीं देना चाहिए। भाजपा से राजनीतिक लड़ाई लड़ना भगवंत मान का अधिकार है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषय को उसकी कथित साजिश से जोड़कर बयान देना आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई को कहीं-न-कहीं कमजोर करता है। हमारे देश में ऐसी घटनाओं के पीछे पाकिस्तान का हाथ जरूर होता है। पंजाब की शांति और समृद्धि उसकी आंखों में दशकों से खटक रही हैं। इस राज्य के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा लगती है। इसने आतंकवाद का दर्दनाक दौर देखा है। अब उसके मुख्यमंत्री बेबुनियाद बयान दे रहे हैं! क्या भगवंत मान नहीं जानते कि उनके शब्दों पर पाकिस्तानी मीडिया और आईएसआई की नजरें रहेंगी? वे इस बयान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सकते हैं। आज से एक साल पहले जब ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया गया था, तब भारत में कई लोग पहलगाम हमले के लिए पाकिस्तान के बजाय अपने ही देश के सुरक्षा बलों और एजेंसियों को कोस रहे थे। उनमें से कुछ तो 'आंतरिक साजिश' के तार जोड़कर यह साबित करने में व्यस्त थे कि इस हमले के लिए पाकिस्तान जिम्मेदार नहीं है, बल्कि सारा दोष हमारा ही है। उनकी सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियो को पाकिस्तान ने जोर-शोर से चलाया था। उन लोगों से पूछना चाहिए, 'आप किस आधार पर ऐसा दावा कर सकते हैं कि आतंकवादी घटनाओं के पीछे पाकिस्तान का हाथ नहीं है? क्या आपको कोई विशेष खुफिया रिपोर्ट मिली है? अगर हां, तो वह आपको कैसे मिली? अगर नहीं, तो अनर्गल बयान देकर खुद को विशेषज्ञ साबित क्यों करना चाहते हैं?'
देश में पिछले कुछ वर्षों में एक ऐसे वर्ग का उदय हुआ है, जो हर घटना के पीछे 'आंतरिक साजिश' ढूंढ़ लेता है। उसके अनुसार, पहलगाम, पुलवामा, पठानकोट और उरी हमले में पाकिस्तान की कोई भूमिका नहीं थी। उस 'मासूम' को तो भारतीय मीडिया ने यूं ही बदनाम कर दिया! जब मुंबई में 26/11 के हमले हुए थे तो कुछ 'तेजस्वी' लोगों के समूह ने एक किताब का विमोचन कर यह साबित करने के लिए पूरा जोर लगा दिया था कि इसके साथ पाकिस्तान का नाम न जोड़ा जाए। अगर आतंकवादी कसाब न पकड़ा जाता तो वे इस झूठ को फैलाने में कामयाब हो जाते। पाकिस्तानी मीडिया आज भी उस किताब का जिक्र कर अपने मुल्क की छवि चमकाने की कोशिश करता है कि 'भारत के कुछ 'बुद्धिजीवी' यह स्वीकार कर चुके हैं कि हमला किसी और का काम था, हमारा नाम तो यूं ही घसीटा जा रहा है।' क्या ऐसी किताबें लिखने, गलत बयान देने से पाकिस्तान को अपना बचाव करने के लिए मजबूत तर्क नहीं मिल जाता है? अब भगवंत मान भी अनर्गल बातें कर सुर्खियों में आ रहे हैं। जब पाकिस्तान में फौज और आईएसआई के अधिकारी ऐसे बयान सुनते होंगे तो ठहाके लगाते होंगे। वे सोचते होंगे कि ये लोग हमारा ही काम आसान कर रहे हैं। इस समय वरिष्ठ राजनेताओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे पाकिस्तान को चेतावनी दें और इस बात पर खास जोर दें कि राजनीतिक मतभेद चलते रहते हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में हम सब एक हैं। गैर-जिम्मेदार ढंग से दिए गए बयान किसी नेता को चर्चा में जरूर ला सकते हैं। वे उसे महान नहीं बना सकते। अगर उन्हें अपना ख़याल नहीं है तो कोई बात नहीं; वे इस महान देश का तो कुछ ख़याल करें।

