बंगाल को यह क्या बना दिया दीदी?
राज्य को किस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया?
अराजकता का यह नाच क्यों हो रहा है?
पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हिंसा का तांडव देखने को मिल रहा है। पिछले चुनावों की तुलना में इस बार हिंसा कम हुई, लेकिन अपराधी तत्त्वों ने अपना रंग दिखा ही दिया। भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी के सहयोगी की जिस तरह हत्या की गई, उससे यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि प. बंगाल में अपराधी बेखौफ हैं। इससे पहले, भाजपा के एक नवनिर्वाचित विधायक के भाई की हत्या कर दी गई थी। उत्तर 24 परगना जिले के पनिहाटी में एक धमाके में भाजपा के पांच समर्थक घायल हो गए। ममता दीदी, आपने प. बंगाल को यह क्या बना दिया? महान संतों, सुधारकों, विद्वानों और स्वतंत्रता सेनानियों की धरती पर अराजकता का यह नाच क्यों हो रहा है? ममता बनर्जी ने अपने डेढ़ दशक के शासन के बाद प. बंगाल को किस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया? इस राज्य से जैसी तस्वीरें आ रही हैं, वैसी पहले कश्मीर से आती थीं। ऐसा लगता है कि प. बंगाल में जो गुंडे-बदमाश अब तक कहीं खामोश बैठे थे, उनकी रस्सी खोल दी गई है। वे अनियंत्रित होकर मनमर्जी से लोगों को सींग मार रहे हैं। ये घटनाएं केंद्रीय गृह मंत्रालय और प. बंगाल की नई सरकार के लिए भी खास संकेत हैं। इस राज्य में कानून-व्यवस्था की हालत खराब है। अगले पांच वर्षों में अपराधियों के गठजोड़ को तोड़ना होगा। ऐसी सख्त कार्रवाई करनी होगी कि या तो बदमाश सुधर जाएं या जेल जाएं। आम आदमी निर्भय होकर रहे, इसके लिए पुलिस तंत्र में कई सुधार करने होंगे। अधिकारियों को जवाबदेह बनाना होगा। प. बंगाल में जो माहौल बनाया गया है, वह व्यापार के अनुकूल नहीं है। अस्सी के दशक में कोलकाता में रेस्टोरेंट का संचालन कर चुके एक राजस्थानी शख्स बताते हैं कि इस अवधि में सिर्फ सरकारें बदली हैं, प. बंगाल के हालात नहीं बदले हैं। उस ज़माने में भी अपराधी बेलगाम थे। वे झुंड बनाकर रेस्टोरेंट में आते, भर-भरकर थालियां चट करते और जाते समय गोली मारने की धमकी देते थे।
एक बार जब उनसे रुपए मांगे गए तो उन्होंने रेस्टोरेंट में जमकर तोड़फोड़ की। वे दावा करते थे कि एक राजनीतिक दल से जुड़े हुए हैं और हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। हर व्यापारी उनकी नजरों में एक शोषक प्राणी था। उनसे परेशान होकर कई लोगों ने अपने प्रतिष्ठान बंद कर दिए और अन्य राज्यों में चले गए। इससे स्थानीय श्रमिक बेरोजगार हो गए। तृणकां पर आरोप लगते रहे हैं कि उसके सत्ता में आते ही कई अपराधी उसके झंडे तले आकर और ज्यादा ताकतवर हो गए। जो पहले लोगों को डराते-धमकाते थे, वे और ज्यादा खूंखार हो गए। इन आरोपों को नकारा जा सकता है, लेकिन इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि तृणकां के शासन में कानून-व्यवस्था में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ। अगर सुधार होता तो आज इतनी हिंसा नहीं होती। ममता बनर्जी चाहतीं तो सुधारों की एक स्वस्थ परंपरा विकसित कर सकती थीं, पिछली सरकारों के कार्यकाल में हुईं गलतियों को ठीक कर सकती थीं। उन्होंने तो चुनाव हारने के बाद एक ऐसी परंपरा की नींव डालने की कोशिश की, जो हमारे लोकतंत्र के लिए अशुभ है। इस्तीफा न देने की जिद ने भविष्य में कई नेताओं के लिए ड्रामेबाजी के रास्ते खोल दिए हैं। वे भी यह कुतर्क देकर इस्तीफा देने से आनाकानी कर सकते हैं कि 'ईवीएम में गड़बड़ थी, हम हारे नहीं हैं, हमें तो गलत तरीके से हराया गया है।' कई अपराधी यह कहकर जेल जाने से इन्कार कर सकते हैं कि 'कानूनी प्रावधान गलत हैं, क्योंकि वे हमें बुरा व्यक्ति मानते हैं ... हमारे गिरोह के सदस्यों से पूछें, उनकी नजरों में हम भले हैं ... हम फंसे नहीं हैं, हमें फंसाया गया है।' क्या किसी राज्य का शासन ऐसे चल सकता है? ममता के अड़ियल रवैए ने लोकतंत्र को लज्जित किया है। जो कभी संविधान बचाने की बड़ी-बड़ी बातें करते थे, अब वे खुद उसका सम्मान नहीं कर रहे हैं।

