प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्ति कब?
इसका आसानी से क्षरण नहीं होता
यह एक वैश्विक समस्या है
'द लांसेट प्लैनेटरी हेल्थ' में प्रकाशित एक अध्ययन ने महत्त्वपूर्ण मुद्दे की ओर सबका ध्यान आकर्षित किया है। आज प्लास्टिक के कारण होने वाले प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ गया है। इससे मानव स्वास्थ्य के अलावा पर्यावरण को भी नुकसान हो रहा है। शोधकर्ताओं का यह अनुमान एक गंभीर समस्या की ओर संकेत दे रहा है कि 'वैश्विक प्लास्टिक प्रणाली के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव के मामले साल 2016 की तुलना में साल 2040 में दोगुने से भी ज्यादा हो जाने की आशंका है।' प्लास्टिक को आधुनिक जीवन की सुविधा का प्रतीक माना जाता है। इसका जीवन चक्र बहुत जटिल होता है। इसका आसानी से क्षरण नहीं होता। यह वर्षों तक उसी स्थिति में रहता है। प्लास्टिक का अधिकांश हिस्सा एकल उपयोग के लिए बनाया जा रहा है। पैकेजिंग, बोतलों और बैग के तौर पर इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक कुछ घंटों के बाद अनुपयोगी हो जाता है। इसे जलाने पर विषैली गैसें निकलती हैं, जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही चेतावनी दे चुका है कि प्लास्टिक प्रदूषण से जुड़े रसायन मानव शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। यही नहीं, समुद्री जीवों के लिए भी प्लास्टिक एक खतरा बन चुका है। कई लोग तटवर्ती इलाकों में जश्न मनाने जाते हैं और वहां प्लास्टिक कचरा बिखेर देते हैं। उन्हें इस बात की परवाह नहीं होती कि यह कचरा समुद्र में जाकर कई जीवों के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है। समुद्री जीवों में माइक्रोप्लास्टिक के अंश से पता चलता है कि अब खतरा थल और जल, दोनों जगह है।
यह एक वैश्विक समस्या है, जिसका समाधान भारत कर सकता है। याद करें, अस्सी और नब्बे के दशक तक पत्तलों का काफी चलन था। क्या आज प्लास्टिक की प्लेटों की जगह पत्तलों की वापसी नहीं हो सकती? उन्हें आधुनिक तकनीक की मदद से और बेहतर एवं आकर्षक बनाया जा सकता है। वे हर स्थिति में प्लास्टिक की प्लेटों से बेहतर ही होंगी। जिन पौधों का इस्तेमाल पत्तल बनाने में किया जाता है, उनकी खेती करने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करना चाहिए। हमें प्लास्टिक स्ट्रॉ के प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प ढूंढ़ने होंगे। इन दिनों नारियल की पत्तियों से बने स्ट्रॉ, बांस के स्ट्रॉ, घास के स्ट्रॉ और अन्य वनस्पतियों के स्ट्रॉ चर्चा में हैं। अगर उनके इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाए तो भारत पूरी दुनिया को स्ट्रॉ का निर्यात कर सकता है, क्योंकि यहां प्राकृतिक निर्माण सामग्री भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। इसी तरह आइसक्रीम कोन के लिए केले का पत्ता इस्तेमाल किया जा सकता है। भारत में कुछ विक्रेताओं ने ऐसे प्रयोग किए हैं, जिन्हें बहुत सराहना मिली है। दैनिक जीवन में प्लास्टिक के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने के लिए जरूरी है कि कोई बेहतर विकल्प पेश किया जाए। लोग खरीदारी करने जाते हैं तो बाजार से सामान के साथ प्लास्टिक के बैग भी लेकर आ जाते हैं। क्या प्राकृतिक रेशों से बने बैग इनकी जगह नहीं ले सकते? ऐसे बैग्स को आकर्षक स्वरूप में पेश करना चाहिए। जब बाजार में सस्ते, सुंदर, टिकाऊ और प्रकृति के अनुकूल बैग उपलब्ध होंगे तो लोग उन्हें जरूर खरीदेंगे। अगर हम अभी जागरूक होकर उचित कदम नहीं उठाएंगे तो साल 2040 तक प्लास्टिक के प्रदूषण से लाखों लोग प्रभावित होंगे। यही सही समय है जब हमें प्लास्टिक पर निर्भरता कम करनी चाहिए और सतत विकास की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा हम सबकी जिम्मेदारी है।

