यूजीसी नियम: अविश्वास की दीवार न बनाएं

पीड़ित को न्याय जरूर मिलना चाहिए

यूजीसी नियम: अविश्वास की दीवार न बनाएं

किसी के साथ भेदभाव न हो

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में जातिगत भेदभाव को रोकने और समानता को बढ़ावा देने के लिए लागू किए गए नियमों ने कई आशंकाएं पैदा कर दी हैं। अभी ये नियम ही पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। उनकी कई तरह से व्याख्या की जा रही है। अगर समता समिति में एससी, एसटी, ओबीसी, दिव्यांग और महिला के साथ सामान्य वर्ग का अनिवार्य प्रतिनिधित्व होता तो आज सड़कों पर इतना आक्रोश न होता। सामान्य वर्ग के लोग यह सोचने को मजबूर हैं कि हमारे बच्चों को पहले ही शक के दायरे में ले लिया गया है। देश में जातिगत भेदभाव एक कड़वी सच्चाई है। इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। हालांकि इसमें बहुत कमी आई है। जो व्यक्ति इसका पीड़ित है, उसे न्याय मिलना चाहिए, लेकिन इस प्रणाली में किसी के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। नियम ऐसे हों जो भेदभाव को खत्म करें, सामाजिक समरसता को बढ़ावा दें। यूजीसी के उक्त नियम सभी वर्गों का विश्वास जीतने में कहीं-न-कहीं विफल रहे हैं। आंदोलन कर रहे लोग यह नहीं कह रहे कि नियम लागू न किए जाएं। बेशक नियम लागू करें, लेकिन सबको अनिवार्य प्रतिनिधित्व देने के साथ उनकी आशंकाओं का निवारण करें। किसी भी नियम-कानून को लागू करने से पहले उसके दूसरे पहलू को जरूर देखना चाहिए। कहीं उसका दुरुपयोग तो नहीं होगा? कहीं वह निर्दोष के लिए फांसी का फंदा तो नहीं बन जाएगा? ध्यान रहे, पूर्व में दहेज प्रथा और जातिगत भेदभाव को दूर करने के लिए संसद ने जो कानून बनाए थे, उनका बहुत दुरुपयोग हुआ है। उन पर उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने चिंता जताई है। फर्जी मुकदमों के कारण हजारों लोगों की जिंदगी बर्बाद हुई है।

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सामान्य वर्ग की एक चिंता यह है कि अब उच्च शिक्षण संस्थानों में उनके बच्चों को बेवजह निशाना बनाया जाएगा। झूठी शिकायतों की रोकथाम के लिए कोई पुख्ता व्यवस्था न होने से संस्थान जातिगत झगड़ों के मैदान बन सकते हैं। जो उम्र पढ़ाई-लिखाई और नए दोस्त बनाने की होती है, उसमें बच्चे डर के साए में रहेंगे। इन नियमों से समरसता कितनी बढ़ेगी, यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन कई अभिभावक अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए यह जरूर कहेंगे कि वे बहुत सोच-समझकर ही किसी से दोस्ती करें। बच्चे भी अन्य वर्ग के सहपाठियों से बातचीत करने से कतराएंगे। क्या इससे समावेशी समाज का निर्माण होगा? विद्यार्थी जीवन में प्रतिस्पर्द्धा की भावना होती है। कक्षा में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले बच्चे से कुछ सहपाठियों को ईर्ष्या हो सकती है। अगर सामान्य वर्ग के किसी प्रतिभावान विद्यार्थी के खिलाफ झूठी शिकायत कर दी जाए तो क्या होगा? संस्थान तो खुद को बचाने के लिए कार्रवाई कर देगा। उस विद्यार्थी का भविष्य चौपट हो जाएगा। अगर वह बाद में निर्दोष साबित हो जाए तो यह राहत काफी नहीं होगी, क्योंकि इस दौरान उसे जो मानसिक पीड़ा होगी, पढ़ाई का नुकसान होगा, छवि पर दाग लगेगा, उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकेगा। कौन माता-पिता चाहेंगे कि उनकी प्रतिभावान संतानें पढ़ाई करने जाएं और पेशी भुगतें? ऐसी स्थिति में साधन संपन्न लोग अपने बच्चों को विदेश भेजना चाहेंगे, जिससे प्रतिभा पलायन होगा। क्या इससे हम विश्वगुरु बनेंगे? जब एक पक्ष के पास असीमित अधिकार हों, उसे दंड का कोई भय न रहे तो भविष्य में विवाद कम नहीं होंगे, बल्कि बढ़ेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए। यूजीसी के नियमों के जरिए उच्च शिक्षण संस्थानों में हर विद्यार्थी को संरक्षण दिया जाए। किसी के साथ भेदभाव न हो। कोई भी खुद को पराया न समझे। यही सच्चा सामाजिक न्याय होगा।

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