जनभागीदारी से बदल रहा भारत

सिर्फ शिकायत करते रहने से उनका समाधान नहीं होगा

जनभागीदारी से बदल रहा भारत

संयम और दृढ़ संकल्प ही बुरी आदतों से दूर रख सकता है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गणतंत्र दिवस से पहले, 'मन की बात' कार्यक्रम में विभिन्न समस्याओं के समाधान ढूंढ़ने वाले लोगों का उल्लेख कर उनका हौसला बढ़ाया है। देश में कई समस्याएं हैं। सिर्फ शिकायत करते रहने से उनका समाधान नहीं होगा। इसके लिए लोगों को आगे आना होगा। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में तमसा नदी की सफाई कर उसे 'नया जीवन' देने वाले लोगों का प्रयास सराहनीय है। प्रदूषण के कारण इस नदी की धारा अवरुद्ध हो रही थी। अब लोगों ने इसे निर्मल बना दिया है। नदियां मनुष्य को जीवन देती हैं। उनका अस्तित्व बचाने के लिए मनुष्य को आगे आना चाहिए। अक्सर कहा जाता है कि यूरोप में कई जगह नदियां बहुत साफ हैं। वे लोग अपनी नदियों में कचरा नहीं डालते। वहीं, भारत में कई नदियों को माता का दर्जा दिया जाता है, लेकिन लोग उनमें कचरा डालकर प्रदूषित करते हैं। अगर हम अपना रवैया नहीं बदलेंगे तो नदियां कैसे साफ रहेंगी? हमें उनकी पवित्रता और स्वच्छता का ध्यान रखना होगा। देश के कई इलाकों में पेयजल की गंभीर समस्या है। भू-जल का इतना दोहन किया गया है कि उसका स्तर गिरता जा रहा है। पहले, जहां थोड़ी-सी खुदाई पर पानी मिल जाता था, अब कुआं गहरा खोदना पड़ता है। कई जगह तो बहुत गहरी खुदाई के बावजूद पानी नहीं मिलता। आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में भी सूखे की गंभीर समस्या रही है। वहां स्थानीय लोगों ने जलाशयों को साफ किया। इससे भू-जल का स्तर बढ़ गया। उन्होंने हजारों पौधे लगाकर हरियाली को बढ़ावा दिया। इससे इलाके की तस्वीर ही बदल गई। ऐसे प्रयास उन इलाकों के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं, जहां भू-जल स्तर काफी नीचे चला गया है। वर्षाजल की एक-एक बूंद का सदुपयोग करना चाहिए।

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देश के युवाओं में भजन क्लबिंग की बढ़ती लोकप्रियता उत्साहजनक है। नशे से दूरी और भगवान के भजनों में रुचि - यह ऐसा बदलाव है, जिसकी वर्षों से प्रतीक्षा थी। एक ओर जहां कुछ लोग युवा शक्ति को हिंसा और अभद्रता का महिमा मंडन करने वाले गानों से गुमराह कर रहे हैं, वहीं भजन क्लबिंग में मर्यादा का पूरा ध्यान रखा जाता है। इस चलन का सभी शहरों में प्रसार होना चाहिए। साथ ही, यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में भी इसकी मर्यादा और शुचिता कायम रहे। गुजरात में बेचराजी के चंदनकी गांव की एक परंपरा से प्रेरणा ली जा सकती है। यहां के लोग, खासकर बुजुर्ग अपने घरों में खाना नहीं बनाते, क्योंकि कम्युनिटी किचन की अनूठी परंपरा जारी है। पूरे गांव के लिए एक ही जगह खाना बनता है और सभी लोग साथ बैठकर खाना खाते हैं। डेढ़ दशक से चली आ रही यह परंपरा समाज को एकता के सूत्र में बांधती है। क्या यह परंपरा अन्य गांवों में शुरू की जा सकती है? इससे समाज में समानता की स्थापना होगी। यह परंपरा पारिवारिक भावना को बढ़ावा देगी। इससे गृहिणियों का समय बचेगा। वे अन्य काम कर सकेंगी। अनंतनाग के शेखगुंड गांव में नशाखोरी की समस्या का अनूठा समाधान प्रशंसनीय है। इस गांव में दुकानदारों ने तंबाकू उत्पाद बेचने बंद कर दिए। इससे युवाओं में जागरूकता बढ़ी। अगर नशाखोरी की सामग्री दुकानों पर उपलब्ध नहीं होगी तो लोग अपनेआप नशे से दूरी बना लेंगे। हालांकि इसमें कुछ दिक्कतें हैं। कई लोग दूसरे विकल्प ढूंढ़ लेते हैं। उदाहरण के लिए, जहां शराब पर पाबंदी होती है, वहां तस्करी और जहरीली शराब की बिक्री के मामले देखने को मिलते हैं। एकतरफा पाबंदियां नशाखोरी पर कुछ हद तक नियंत्रण लगा सकती हैं। किसी व्यक्ति का संयम और दृढ़ संकल्प ही उसे बुरी आदतों से दूर रख सकता है।

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