इंडि गठबंधन को बड़ा झटका

नीतीश की राजग में वापसी से इंडि गठबंधन को लेकर संभावनाएं धूमिल होती जा रही हैं

इंडि गठबंधन को बड़ा झटका

ममता बनर्जी पहले ही कह चुकी हैं कि राज्य में तृणमूल कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ेगी

बिहार में ‘गठबंधन’ के प्रयोगों और नीतीश कुमार के फिर से राजग में लौट आने को देखकर यही कहा जाना चाहिए कि राजनीति में कुछ भी हो सकता है। नीतीश पर उनके आलोचक भले ही ‘अवसरवादी’ होने का आरोप लगाएं, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्होंने पिछले एक दशक में जिस तरह जोड़-तोड़ किए हैं, उससे राजनीति के बड़े-बड़े धुरंधर भी हैरत में पड़ गए हैं। नीतीश लंबे अरसे तक राजग में रह चुके हैं। तत्कालीन वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे नीतीश कुमार ने साल 2013 में नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में मजबूती से उभरने के दौरान ही तीखे तेवर दिखाने शुरू कर दिए थे। उन्होंने सेकुलरिज्म के नाम पर राजग से रिश्ता तोड़ लिया था। फिर, अपने धुरविरोधी लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद के साथ गठजोड़ किया, लेकिन वह प्रयोग भी उन्हें ज्यादा दिन रास नहीं आया। उन्होंने साल 2022 में ‘महागठबंधन’ में फिर वापसी की, जिसके बाद राजग नेताओं की ओर से उन पर खूब शब्दबाण छोड़े गए थे। उन्होंने भी खूब पलटवार किए। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि अब जदयू और राजग की राहें हमेशा के लिए जुदा हो गईं, लेकिन नीतीश ने एक बार फिर सबको ‘चक्कर’ में डाल दिया। आलोचक कहते हैं कि नीतीश पर कभी विश्वास नहीं किया जा सकता, लेकिन उनके प्रशंसक कहते हैं कि बिहार, जहां की राजनीति इतनी पेचीदा है, वहां खुद के पास बहुमत न हो, तो भी सरकार बनाने और चलाने का हुनर नीतीश से बेहतर कोई नहीं जानता! बहरहाल, उनके ‘महागठबंधन’ छोड़ने से विपक्ष के इंडि गठबंधन को बड़ा झटका जरूर लगा है। माना जा रहा था कि अगर नीतीश इंडि गठबंधन में रहते तो बड़ी भूमिका पाते। हालांकि उनके आने से राजग मजबूत हुआ है। अगर यह गठबंधन लोकसभा चुनावों में भी कायम रहा तो उन्हें ‘बड़ी भूमिका’ मिल सकती है।

नीतीश की राजग में वापसी से इंडि गठबंधन को लेकर संभावनाएं धूमिल होती जा रही हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले ही कह चुकी हैं कि राज्य में तृणमूल कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ेगी। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि शिष्टाचार के नाते भी यह सूचित नहीं किया कि प. बंगाल में ‘न्याय यात्रा’ निकाली जाएगी। तृणमूल के प्रवक्ता कुणाल घोष तो यह कह चुके हैं कि कांग्रेस सीट बंटवारे को लेकर ‘अनुचित सौदेबाजी’ नहीं कर सकती। तृणमूल कांग्रेस नेता डेरेक ओ ब्रायन प. बंगाल में कांग्रेस और उनकी पार्टी के बीच गठबंधन के कारगर नहीं होने के लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं। उन्हीं के शब्दों में - ‘बंगाल में गठबंधन के कारगर नहीं होने के पीछे तीन कारण हैं- अधीर रंजन चौधरी, अधीर रंजन चौधरी और अधीर रंजन चौधरी।’ स्पष्ट है कि कांग्रेस इंडि गठबंधन में नेतृत्व की भूमिका में रहने के लिए प. बंगाल से ज्यादा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है, जबकि तृणमूल कांग्रेस ज्यादा ‘उदारता’ दिखाने के लिए तैयार नहीं है। प. बंगाल में राहुल गांधी को  ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के तहत जनसभाएं नहीं करने दी गईं। इसके पीछे स्थानीय प्रशासन की ओर से बच्चों की परीक्षाएं होने की दलील दी गई। जब ‘न्याय यात्रा’ जलपाईगुड़ी पहुंची तो ममता बनर्जी के समर्थकों ने पोस्टर दिखाए, जिन पर ‘दीदी बनेंगी प्रधानमंत्री’ लिखा था। अब बिहार में नीतीश के दांव से राजद के साथ कांग्रेस की उम्मीदों को तगड़ा झटका लगा है। माना जाता है कि राजद नेतृत्व चाहता था कि नीतीश केंद्र की राजनीति में जाएं और बिहार में सरकार लालू यादव के बेटे चलाएं, जबकि नीतीश बिहार में अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देना चाहते थे। कांग्रेस यहां कमजोर स्थिति में है। वह अधिकाधिक सीटें तो चाहती है, लेकिन राज्य में उसके पास कोई करिश्माई नेतृत्व नहीं है। पंजाब, जहां लंबी अवधि तक कांग्रेस ने सरकार चलाई, अब वहां आम आदमी पार्टी सत्तारूढ़ है। मुख्यमंत्री भगवंत मान कांग्रेस के साथ सीटें साझा करने के इच्छुक नजर नहीं आ रहे हैं। दिल्ली में भी अरविंद केजरीवाल का कांग्रेस को ज्यादा सीटें देना मुश्किल लगता है। यहां ‘आप’ ने कांग्रेस को हराकर ही सत्ता पाई थी। ऐसे में राष्ट्रीय राजधानी में कांग्रेस का मजबूत होना कालांतर में ‘आप’ के लिए खतरे की घंटी होगा, जो केजरीवाल भलीभांति जानते हैं। वर्तमान में इंडि गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती अपने घटक दलों में तालमेल बैठाने के साथ ही सबको एकजुट रखना भी है। अगर लोकसभा चुनाव से पहले कोई और बड़ा घटक दल अलग हो गया तो इंडि गठबंधन के लिए लड़ाई ज्यादा मुश्किल हो जाएगी।

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