कमजोर पड़ती आप

कमजोर पड़ती आप

दिल्ली में हुए अन्ना आंदोलन के बाद घटित आम आदमी पार्टी बहुत कम समय में एक मजबूत राजनैतिक विकल्प के रूप में उभरी थी परंतु जितनी ऱफ्तार से पार्टी मजबूत हुई थी उससे भी अधिक तेजी से आम आदमी पार्टी कम़जोर प़डती ऩजर आने लगी है। जब पार्टी का गठन हुआ था तो यह आशंका लगाई जा रही थी कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेर रही आम आदमी पार्टी को जनसमर्थन हासिल होगा और यह अंदेशा सच भी निकला। दिल्ली में पहले ४९ दिनों की सरकार बनाने के बाद फरवरी २०१५ में दोबारा ६० में से ५७ सीटों पर जीत हासिल कर आम आदमी पार्टी ने शानदार वापसी की थी। जिस तरह की जीत पार्टी को मिली थी उससे कांग्रेस और भाजपा के रणनीतिज्ञों के होश उ़ड गए थे। हाल ही में पंजाब और गोवा के विधानसभा चुनावों में पार्टी ने अपने उम्मीदवार ख़डे किये थे और कई जगहों पर पार्टी उम्मीदवार की ़जमानत भी जप्त हो गयी। परंतु दुःख की बात यह है कि केवल दो ही वर्षों में आम आदमी पार्टी पर दिल्ली की जनता का भरोसा भी कम होता ऩजर आ रहा है। हाल ही में हुए दिल्ली निगम चुनावों की जीत भाजपा के नाम रही। हालाँकि राजनैतिक दलों के लिए चुनाव में जीत हार का सिलसिला चलता ही रहता है परंतु दिल्ली निगम चुनावों में आप की हार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर सत्ता में सत्तावन विधायक होने के बावजूद पार्टी निगम चुनावों में अपनी पक़ड बनाने में विफल रही है तो यह अवश्य पार्टी के लिए ब़डी हार है। दो साल पूर्व जिस तरह का भरोसा दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी पर दिखाया था उससे पार्टी के प्रमुख नेताओं को अपनी जिम्मेदारियों को समझकर जनता की सेवा को महत्व देना चाहिए था परंतु हुआ यह कि दिल्ली की जीत के बाद आप के नेताओं को भ्रम हो गया की उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्तर की राजनीति के लिए तैयार है और अरविन्द केजरीवाल सहित अन्य ब़डे नेता अन्य राज्यों में पार्टी के राजनैतिक सफर की परिकल्पना को सच करने के लिए योजनाओं को बनाने में जुट गए। दिल्ली की जनता की मांग को ऩजर अंदा़ज किया जाने लगा। जनता की परेशानियों को सुलझाने के लिए के बदले किसी भी समस्या का आरोप केंद्र सरकार पर थोपने की कोशिश की जाने लगी। हालाँकि अब दिल्ली में निगम चुनावों में करारी हार के बाद पार्टी के नेता घर-घर जाकर जनता की बात सुनने का आश्वासन देते ऩजर आ रहे हैं, लेकिन लगता नहीं है कि यह कदम पार्टी को मजबूत बनाने के लिए काफी होगा। सच तो यह है कि अगर आम आदमी पार्टी अपने राष्ट्रीय राजनैतिक सपने को संजोने में इतनी जल्दबा़जी नहीं दिखाती तो संभव है कि दिल्ली में केन्द्र सरकार और मोदी के खिलाफ टकराव की राजनीति नहीं करती तो उसका फायदा उसे होता। अगर आप को अपने राजनैतिक औचित्य को बरकारार रखना है तो निश्चित रूप से पार्टी के सभी विधायकों को अगले तीन वर्ष अपने- अपने विधानसभा क्षेत्र के लोगों को समर्पित कर क्षेत्र के विकास के लिए दिन रात मेहनत करनी होगी। आप लगातार कम़जोर प़ड रही है और अगर अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया सहित पार्टी के प्रमुख नेताओं ने खतरे को भांपते हुए स्थिति को नहीं संभाला तो पार्टी का अस्तित्व खतरे में प़ड सकता है।

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