सामूहिक व्यवहार ऐसा क्यों?

छोटी-छोटी आदतों से ही राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण होता है

सामूहिक व्यवहार ऐसा क्यों?

बच्चों को स्कूली जीवन से ही यह शिक्षा दी जाए ...

दिल्ली, बेंगलूरु और मुंबई में एक मशहूर ब्रांड की घड़ी खरीदने उमड़े लोगों ने जिस तरह हंगामा खड़ा किया, उससे सामूहिक व्यवहार को लेकर गहरी चिंता पैदा होती है। सार्वजनिक स्थान पर खड़े होने, चलने और बोलने का एक तरीका होता है। उससे हमारे बारे में कई बातों का पता चलता है। शिक्षित लोगों से उम्मीद की जाती है कि सार्वजनिक स्थानों पर उनका व्यवहार आदर्श होगा, लेकिन हाल के वर्षों में ऐसे कई मौके आए, जब भीड़ ने यह साबित किया कि हममें अनुशासन की भारी कमी है। लोगों को इसका भलीभांति प्रशिक्षण मिलना चाहिए। अगर कोई महंगी घड़ी पेश की जा रही है और काफी लोग उसे खरीदने के इच्छुक हैं तो यह काम शांतिपूर्वक भी हो सकता है। इसके लिए शोर-शराबा करने, कर्मचारियों से उलझने की क्या जरूरत है? एक घड़ी ही तो है! अगर आज नहीं मिली तो दो दिन बाद मिल जाएगी। ऐसा तो नहीं है कि जिसे पहले मिल गई, उसे विश्वविजेता की उपाधि दे दी जाएगी। इससे पहले, एक कंपनी का स्मार्टफोन खरीदने के लिए भीड़ ने इसी तरह अनुशासनहीनता दिखाई थी। कई लोगों ने जल्दी फोन खरीदने के लिए अन्य लोगों के साथ धक्का-मुक्की की। अच्छे-खासे पढ़े-लिखे, धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने वाले दूसरों को कोहनी मारते, अभद्र शब्द बोलते और शोर मचाते नजर आए थे। एक फोन के लिए इतने पापड़ बेलने की क्या जरूरत है? फोन ही है, कोई जादुई चिराग तो नहीं है कि उसे घिसते ही सारे अरमान पूरे हो जाएंगे! यह इस दुनिया का अंतिम फोन भी नहीं है। अगर आज नहीं मिला तो एक हफ्ते बाद मिल जाएगा। ऐसी चीजों के लिए हुड़दंग मचाकर हम अपने देश की कैसी छवि बना रहे हैं? अब सोशल मीडिया का जमाना है। कोई खबर कुछ ही सेकंडों में पूरी दुनिया में फैल जाती है। जब विदेशों में लोग हमारा ऐसा सामूहिक व्यवहार देखते हैं तो क्या सोचते हैं?

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जापान का एक पर्यटक भारत घूमने आया तो उसने स्वदेश लौटकर हमारे खानपान और संस्कृति की बहुत तारीफ की। एक बात उसे अजीब लगी। उसने कहा, 'भारत में लोग बहुत हड़बड़ी में रहते हैं। जब लाल बत्ती हो जाती है, तब भी हॉर्न बजाते हैं और अपने वाहन को अगले वाहन के बिल्कुल नजदीक ले जाकर खड़ा कर देते हैं।' इन गतिविधियों से समय नहीं बचता, बल्कि अव्यवस्था फैलती है। कई लोग हरी बत्ती होने से कुछ पहले ही अपने वाहन को आगे ले जाते हैं। वे चार-पांच सेकंड की बचत कर इस रफ्तार से जाते हैं, जैसे दुनिया को बचाने की जिम्मेदारी इन्हीं के कंधों पर आ पड़ी है। रेलवे क्रॉसिंग पर रोजाना ही अजीब नजारे देखने को मिलते हैं। वहां तैनात कर्मचारी को फाटक बंद करने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। आखिरी सेकंड तक वाहनों में सबसे पहले निकलने की होड़ लगी रहती है। फाटक बंद होने पर भी कई दुपहिया वाहनचालक बाज नहीं आते। वे अपने वाहन को टेढ़ा कर ऐसे निकल भागते हैं, जैसे कोई किला फतह कर लिया। इस हरकत की वजह से हर साल सैकड़ों लोग हादसों के शिकार होते हैं। अगर घर से थोड़ा जल्दी निकलें, रेलवे क्रॉसिंग पर कुछ मिनट इंतजार कर लें तो हादसे की नौबत ही न आए। हमारे देश में कुछ लोगों की एक अजीब आदत अक्सर चर्चा का विषय बनती है। जब कहीं सामान से लदा कोई वाहन पलट जाता है, तब उन लोगों की लॉटरी निकल आती है। वे चालक की मदद करने के बजाय सामान लूटने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। महाराष्ट्र में टमाटरों से भरा एक ट्रक पलटा तो बड़ी संख्या में लोग इकट्ठे हुए। उन्होंने कुछ ही समय में टमाटरों पर हाथ साफ कर दिया। पश्चिम बंगाल में चावल से भरा एक ट्रक दुर्घटनाग्रस्त हुआ तो कई लोगों ने इसे सुनहरा मौका समझा। उत्तर प्रदेश में एक सड़क पर बिस्किट से भरा ट्रक पलटा तो लोग माल समेटने में व्यस्त हो गए। ऐसी घटनाएं बड़े हादसों की वजह बन सकती हैं, खासकर जब वाहन में तेल या कोई ज्वलनशील सामग्री हो। बच्चों को स्कूली जीवन से ही यह शिक्षा दी जाए कि सार्वजनिक स्थानों पर हमारा व्यवहार अच्छा होना चाहिए। छोटी-छोटी आदतों से ही राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण होता है। हमें इस बात का बहुत ध्यान रखना चाहिए।

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