राम गली में अपनी पहचान ढूंढ़ता लाहौर

पाकिस्तान का बेड़ा गर्क करने वाला शख्स जनरल ज़िया था

राम गली में अपनी पहचान ढूंढ़ता लाहौर

जिस पौधे की जड़ कट जाती है, वह कभी पेड़ नहीं बन पाता

पाकिस्तान के लाहौर शहर की कई सड़कों और गलियों के आजादी से पहले के नाम रखने के फैसले से आश्चर्य होता है। अपनी कट्टरता और हिंसा के लिए कुख्यात इस पड़ोसी देश में सकारात्मक बदलाव की यह कोशिश कितना असर दिखा पाएगी? जब पाकिस्तान अस्तित्व में आया था, तब इसके हुक्मरानों के सामने चुनौती थी कि विभाजन के फैसले को हर सूरत में सही ठहराया जाए। साथ ही, अपनी 'हिंदू पहचान' से रिश्ता तोड़ा जाए। इस कोशिश में हर शहर की पुरानी सड़कों, गलियों और इमारतों के नाम बदले गए। संस्कृत, हिंदी, पंजाबी, सिंधी नामों की जगह अरबी-फारसी का बोलबाला हो गया। सरकारी साजिश के तहत हर जगह ऐसा माहौल बनाया गया कि लोग खुद की जड़ें भारत में तलाशने के बजाय इस बात पर झूठा गर्व करें कि हम तो विदेश से आए थे। इस दुष्प्रचार को सबसे ज्यादा हवा जनरल ज़िया-उल हक़ ने दी थी। अब तो कई बुद्धिजीवी खुलकर कहते हैं कि पाकिस्तान का बेड़ा गर्क करने वाला शख्स जनरल ज़िया था। उसने साड़ी को हिंदू पहनावा बताते हुए इसे पहनने को हतोत्साहित किया। कई पकवान, जो सदियों से भारत में बनाए और खाए जा रहे हैं, के नाम बदल दिए गए। ज़िया-उल हक़ का बस चलता तो पाकिस्तान में संगीत पर पाबंदी लग जाती, लेकिन इतनी 'उदारता' दिखाई कि रागों के नाम बदल दिए गए। इसका नतीजा यह निकला कि पाकिस्तानी अपनी असल पहचान भूलते गए। उनमें सहिष्णुता का स्तर बुरी तरह गिर गया। वहां जरा-सी असहमति गोलियों और धमाकों तक पहुंच जाती है। अगर अब वहां की पंजाब सरकार कृष्ण नगर, संत नगर, धरमपुरा, राम गली, लक्ष्मी चौक, जैन मंदिर रोड, मोहन लाल बाजार, सुंदरदास रोड, भगवानपुरा, शांति नगर जैसे नाम वापस रखती है तो इससे लोगों को अपनी जड़ों का पता चलेगा।

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अगर इतिहास के किसी कालखंड में पूजन पद्धति बदल ली तो इसका यह मतलब नहीं है कि उसके पूर्वज भी बदल गए। जिस पौधे की जड़ कट जाती है, वह कभी पेड़ नहीं बन पाता। यह बात अब आम पाकिस्तानी समझने की कोशिश कर रहे हैं। वे इस पर चर्चा कर रहे हैं। हालांकि अभी उनकी संख्या बहुत कम है। देर-सबेर सबको पता चलेगा कि कट्टरता और नफरत के कारण बहुत कुछ गंवा दिया। पाकिस्तान में उन विदेशी आक्रांताओं के नाम पर गलियों और सड़कों के नाम हैं, जिन्होंने किसी ज़माने में वहां लूटमार की थी। जिन्होंने कभी (पाकिस्तानियों के पूर्वजों की) खोपड़ियों के ढेर लगाए थे, महिलाओं से दुष्कर्म किए थे, उन्हें वहां नायक बनाकर पेश किया गया। अब उनकी असलियत सामने आने लगी है। लोगों को इंटरनेट से मालूम हुआ कि तक्षशिला (जो इस्लामाबाद से लगभग 35 किमी दूर है) बहुत बड़ा विश्वविद्यालय था, जिसके विशेषज्ञों ने कई राजाओं को अर्थ प्रबंधन सिखाया था। अगर पाकिस्तानी हुक्मरान इस विरासत से ही कुछ सीख लेते तो दुनियाभर में कटोरा लेकर न फिरते। शहीद भगत सिंह अविभाजित भारत के जिस गांव में जन्मे थे, आज वह पाकिस्तान में आता है। पाकिस्तानियों का दुर्भाग्य देखिए, उन्हें दशकों तक इस महान क्रांतिकारी के बारे में पता ही नहीं था! जब विदेशी लुटेरों और हत्यारों को नायक मानना बंद करेंगे, तब न धरती के सपूतों के बारे में जान पाएंगे। आधुनिक विज्ञान ने पाकिस्तानियों की कई धारणाओं की धज्जियां उड़ा दीं। एक लेखक ने अपने यूट्यूब चैनल पर स्वीकार किया कि उन्हें बचपन से यह पढ़ाया-सिखाया गया था कि 'हम बाहर से आए थे, हमारा भारत से कोई संबंध नहीं है।' जब उन्होंने अपना डीएनए टेस्ट कराया तो पता चला कि उनके सभी पूर्वज भारतीय थे। अगर पाकिस्तान आतंकवाद का रास्ता पकड़ने के बजाय अपनी विरासत और हिंदू पूर्वजों से लगाव रखता तो बहुत समृद्ध देश होता। वहां पर्यटन को खूब बढ़ावा मिलता। अगर आज पाकिस्तानी हुक्मरान इस दिशा में पहला कदम बढ़ा रहे हैं तो यही कहना चाहिए- 'देर आयद, दुरुस्त आयद।'

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