टीएफआर: दावे, चिंता और सच्चाई

भारत की टीएफआर में गिरावट आई

टीएफआर: दावे, चिंता और सच्चाई

इतने लोगों को रोजगार कहां से देंगे?

जब से अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क ने भारत की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) के बारे में टिप्पणी की है, कई यूट्यूबर और टीवी चैनल ऐसा माहौल बनाने में जुट गए हैं कि देश में जनसंख्या वृद्धि रुक गई है, भविष्य में सिर्फ बुजुर्ग दिखाई देंगे और युवा तो कहीं ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेंगे! जनसंख्या जैसे विषय पर पर्याप्त अध्ययन के बाद ही कोई राय देनी चाहिए। पिछले पांच दशकों की बात करें तो यह सच है कि भारत में टीएफआर में गिरावट आई है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि जनसंख्या वृद्धि पर पूर्ण विराम लग गया है और भविष्य में कामकाज करने के लिए युवा ही नहीं बचेंगे। जनसंख्या आज भी बढ़ रही है, बस उसकी रफ्तार कुछ कम हो गई है। देश में लाखों युवा बेरोजगार बैठे हैं। वे बीस हजार रुपए की नौकरी के लिए दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन कुछ लोगों को अचानक इस बात की चिंता सताने लगी है कि भविष्य में कामकाजी लोग नहीं रहेंगे! जो अभी काम ढूंढ़ रहे हैं, उनका क्या? पश्चिमी देशों के कुछ उद्यमी अलग ही दुनिया में रहते हैं। वे अपने वातानुकूलित कक्ष में बैठकर अंग्रेजी में जो कुछ लिख देते हैं, दुनिया में उसे अंतिम सत्य मान लिया जाता है। वे खुद को घनघोर बुद्धिजीवी साबित करने के लिए नए-नए शिगूफे छोड़ते रहते हैं। वे कहते हैं कि 'भविष्य में पृथ्वी जैसा कोई दूसरा ग्रह खोज लिया गया तो उस पर बसाने के लिए लोग कम पड़ जाएंगे ... हम इतने लोग कहां से लाएंगे?' कोई इनसे पूछे, 'पृथ्वी जैसा दूसरा ग्रह खोज भी लिया तो क्या आम आदमी वहां जा पाएगा?' ऐसे अभियानों पर अरबों डॉलर खर्च होते हैं। क्या कोई पश्चिमी उद्योगपति अपनी जेब से यह रकम देगा? कभी नहीं; हमारे लिए यह पृथ्वी ही संसार है। अंतरिक्ष अनुसंधान करना अच्छी बात है, लेकिन हमें रहना पृथ्वी पर ही है। पृथ्वीवासियों का कल्याण सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। क्या आज ऐसा हो रहा है?

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दरअसल पश्चिमी उद्योगपति जनसंख्या को लेकर ऐसे राग इसलिए अलापते रहते हैं, ताकि उन्हें सस्ते मजदूर मिलें, तैयार ग्राहक मिलें, बहुत बड़ा बाजार मिले। आज पढ़ाई, इलाज, आवास, खानपान, परिवहन सबकुछ इतना महंगा हो गया है कि लोग एक बच्चे का पालन-पोषण बड़ी मुश्किल से कर पाते हैं। भारत में ऐसे युवाओं की संख्या बढ़ती जा रही है, जो विवाह नहीं करना चाहते। अगर करते हैं तो संतान को जन्म नहीं देना चाहते, क्योंकि उन्होंने पढ़ाई और नौकरी में जो कुछ बर्दाश्त किया है, उसे अगली पीढ़ी पर नहीं डालना चाहते। एलन मस्क की तरह जिन कथित बुद्धिजीवियों को भारत के आम आदमी के जीवन से जुड़ीं समस्याओं की कोई जानकारी नहीं होती और वे टीएफआर बढ़ाने की बातें करते रहते हैं, उन्हें गर्मी के मौसम में कम से कम एक दिन ट्रेन के जनरल डिब्बे में सफर करना चाहिए। उन्हें दो दिन किसी सरकारी अस्पताल में भर्ती होकर अपने अनुभव लिखने चाहिएं। उन्हें तीन दिन दफ्तरों में नौकरी के लिए प्रार्थना पत्र देने चाहिएं। चौथे दिन वे सारे उपदेश भूल जाएंगे। आज भारत की जनसंख्या 140 करोड़ से ज्यादा बताई जा रही है। जिस दिन यह 170 करोड़ हो जाएगी, तब क्या स्थिति होगी? इतने लोगों को रोजगार कहां से देंगे? क्या हवा सांस लेने लायक रहेगी? क्या पेयजल सबको सुलभ हो पाएगा? क्या सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं मिल पाएंगी? आज का युवा जनसंख्या विस्फोट की भारी कीमत चुका रहा है। जब लोग मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब ज्यादा संतानोत्पत्ति की अपील करना कहां की अक्लमंदी है? हां, इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आज भी कई लोग आधा दर्जन से लेकर डेढ़ दर्जन तक बच्चे पैदा कर रहे हैं। उन्हें न बच्चों की शिक्षा से मतलब है, न देश के संसाधनों की कोई परवाह है। ऐसे लोगों के लिए उचित कानून बनाकर उन्हें कठोर दंड देना चाहिए।

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