ब्राह्मण बार-बार निशाने पर क्यों?
ब्राह्मण समाज अपने प्राणों से भी ज्यादा देश और धर्म से प्रेम करता है
ब्राह्मणों की नकारात्मक छवि बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई
समाजवादी पार्टी (सपा) के एक प्रवक्ता द्वारा ब्राह्मण समाज पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी घोर निंदनीय है। कुछ नेतागण ब्राह्मण समाज की सहिष्णुता को उसकी कमजोरी मानकर उसके बारे में अनुचित टीका-टिप्पणी करते रहते हैं। उन्हें लगता है कि वे इससे ज्ञानी, सेकुलर, आधुनिक और प्रगतिशील कहलाएंगे। वे ब्राह्मण समाज को बार-बार निशाना बना रहे हैं। यह समाज अपने प्राणों से भी ज्यादा अपने देश और धर्म से प्रेम करता है, इसलिए कोई हिंसक प्रतिक्रिया नहीं देता। सपा को अपने इतिहास से सबक लेना चाहिए। किसी समय इस पार्टी की उत्तर प्रदेश में धाक होती थी। इसके सहयोग से दिल्ली में सरकार चलती थी। इसने एक समुदाय विशेष के तुष्टीकरण के कारण अपनी सियासी पकड़ गंवा दी। तुष्टीकरण का दांव बार-बार नहीं चल सकता। यह इस बार पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को भी ले डूबा। क्या अब सपा नेता ब्राह्मण समाज के बारे में अपमानजनक बातें बोलकर नया वोटबैंक तलाशना चाहते हैं? सपा नेतृत्व उन्हें कड़ी फटकार लगाने से परहेज कर रहा है। क्या यह उसकी उदासीनता है या मौन स्वीकृति है? अगर कोई व्यक्ति पथभ्रष्ट है तो उसके निजी आचरण को बुरा बताया जा सकता है, लेकिन पूरे समाज को ही लपेटे में लेना बिल्कुल गलत है। कुछ लोगों ने ब्राह्मण समाज का अपमान करने को अपना पेशा बना लिया है। वे दिन-रात सोशल मीडिया पर विष-वमन करते रहते हैं। चाहे किसी ब्राह्मण ने उनका कोई अहित न किया हो, फिर भी वे ऐसा माहौल बनाते रहते हैं कि दुनिया की हर समस्या के लिए ब्राह्मण जिम्मेदार हैं। अगर उनका बस चले तो ईरान-अमेरिका युद्ध के तार किसी ब्राह्मण के रसोईघर से जोड़ दें और यह कहते फिरें कि इसके कारण गैस सिलेंडर मिलने में देरी हो रही है।
जब बार-बार किसी समाज के बारे में दुष्प्रचार किया जाता है तो अन्य लोगों पर उसका कुछ असर जरूर पड़ता है। फिल्मों से लेकर सोशल मीडिया तक, ब्राह्मणों की नकारात्मक छवि बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। ऐसे दिखाया जाता है, जैसे हर ब्राह्मण चौबीसों घंटे मुफ्त की दावत खाने का इंतजार करता रहता है ... वह कोई कामकाज नहीं करता, बस किसी के भी घर जाकर मंत्र बोलता है और मोटी दक्षिणा ले आता है ... ब्राह्मण के तो ठाठ हैं, क्योंकि हर जगह उसे ही नौकरी दी जाती है ...। ब्राह्मणों के बारे में अनाप-शनाप प्रलाप करना बहुत आसान है। अक्सर ऐसे लोग अपनी कुंठा के कारण उनके परिश्रम और प्रतिभा को नहीं देख पाते। जिस तरह अन्य समुदायों के लोग अपने कामकाज से जीवन चलाते हैं, उसी तरह ब्राह्मण भी अपना जीवन चलाते हैं। कोई उन्हें छप्पन भोग परोसने नहीं आता। ब्राह्मण किसी गांव में खेती-बाड़ी करता हुआ मिल सकता है, तो महानगर में किसी कंपनी का सीईओ भी मिल सकता है। जिन विकसित देशों में दो दिन घूमकर आने को ही बहुत बड़ी उपलब्धि समझ लिया जाता है, वहां के विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में ब्राह्मणों के बच्चे प्रतिष्ठित पदों पर काम कर रहे हैं। वे अपने माता-पिता के त्याग और अपने ज्ञान के दम पर वहां पहुंचे हैं। वे जानते हैं कि परिश्रम से ही अपना रास्ता बनाना होगा, इसलिए न किसी के भरोसे बैठते हैं और न किसी पर दोषारोपण करते हैं। अगर उनकी सफलता देखकर किसी के सीने पर सांप लोटता है तो वे क्या करें! हाल में एक कवि, जो ब्राह्मण परिवार से हैं और रामकथा भी करते हैं, के आलीशान घर को देखकर कई लोगों ने सोशल मीडिया पर उन्हें कोसना शुरू कर दिया था। यह मंडली 'दिलजलों' की ऐसी बारात है, जो किसी को सुखी नहीं देख सकती। अगर कोई ब्राह्मण अपनी प्रतिभा से उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर ले तो उन लोगों की पीड़ा और बढ़ जाती है। वे अपनी कुंठा और निराशा का प्रदर्शन करने के लिए पूरे ब्राह्मण समाज के बारे में अनर्गल बोलने लगते हैं। अगर इतनी ऊर्जा किसी रचनात्मक काम में लगाते तो खुद किसी अच्छे मुकाम पर होते। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे किसी भी समाज के बारे में गलत बयानबाजी करने वाले नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाएं, अन्यथा उन्हें चुनावों में भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

