मुफ्त चीजें देने के चुनावी वादों पर लगेगी लगाम? उच्चतम न्यायालय करेगा जनहित याचिका पर सुनवाई
वकील अश्विनी उपाध्याय ने दाखिल की याचिका
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नई दिल्ली/दक्षिण भारत। उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को एक जनहित याचिका पर मार्च में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई, जिसमें चुनावों से पहले 'अतार्किक मुफ्त उपहार' देने या उनका वादा करने वाली किसी राजनीतिक पार्टी का चुनाव चिह्न जब्त करने या उसका पंजीकरण रद्द करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ता-वकील अश्विनी उपाध्याय ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ को बताया कि उनकी जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग को नोटिस वर्ष 2022 में ही जारी किए जा चुके हैं और उन्होंने मामले को शीघ्र सूचीबद्ध करने का आग्रह किया।वकील ने कहा, 'सूर्य और चंद्रमा को छोड़कर सबकुछ राजनीतिक दल चुनाव के दौरान मतदाताओं से वादा करते हैं और यह एक भ्रष्ट आचरण के समान है।'
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, 'यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। आप कृपया हमें याद दिलाइए और अंत में इसका उल्लेख कीजिए। हम इसे मार्च में सूचीबद्ध करेंगे।'
25 जनवरी, 2022 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा था, जिसमें चुनाव से पहले 'अतार्किक मुफ्त उपहार' देने का वादा करने या उन्हें वितरित करने वाली किसी राजनीतिक पार्टी का चुनाव चिह्न जब्त करने या उसका पंजीकरण रद्द करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
पीठ ने इसे एक 'गंभीर मुद्दा' करार दिया था और कहा था कि कभी-कभी 'मुफ्त उपहारों का बजट नियमित बजट से भी आगे निकल जाता है।'
याचिका में न्यायालय से आग्रह किया गया था कि वह यह घोषित करे कि चुनाव से पहले सार्वजनिक धन से 'अतार्किक मुफ्त उपहारों' का वादा मतदाताओं को अनुचित रूप से प्रभावित करता है, समान अवसर के सिद्धांत को बाधित करता है और चुनावी प्रक्रिया की शुचिता को प्रभावित करता है।
अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे के माध्यम से दायर की गई इस याचिका में, वैकल्पिक रूप से, इस संबंध में कानून बनाने के लिए केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग भी की गई है।
याचिका में कहा गया, 'याचिकाकर्ता का यह प्रस्तुतीकरण है कि चुनावों को ध्यान में रखते हुए मुफ्त उपहार देकर मतदाताओं को प्रभावित करने का हाल का राजनीतिक रुझान न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है, बल्कि संविधान की आत्मा को भी चोट पहुंचाता है।'
इसमें कहा गया, 'यह अनैतिक प्रथा ठीक वैसे ही है जैसे सत्ता में बने रहने के लिए खजाने के पैसे से मतदाताओं को रिश्वत देना, और इसे लोकतांत्रिक सिद्धांतों और प्रथाओं को सुरक्षित रखने के लिए टालना चाहिए।'


