जौहर: इतिहास, परिस्थितियां और दृष्टि
वीर नारियों और क्षत्राणियों ने जौहर किया था
By News Desk
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हर युद्ध के बाद ऐसा नहीं होता था
एक अभिनेत्री जो पिछले डेढ़ दशक में पांच फिल्मों में भी अपने अभिनय की छाप नहीं छोड़ पाईं, ने जौहर के बारे में विवादित बयान देकर इतिहास के संबंध में अपने अल्पज्ञान का परिचय दिया है। जिन वीर नारियों और क्षत्राणियों ने जौहर किया था, उन पर कोई टीका-टिप्पणी करने से पहले इतिहास का अध्ययन करना चाहिए। जो लोग उक्त अभिनेत्री की तरह कथित बुद्धिजीवी बनकर कैमरों के सामने उपदेश देते रहते हैं, वे अपने ख़्वाबों और ख़यालों की दुनिया में रहते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे उस समय होते तो सबकुछ ठीक कर देते। अगर खुद को इतना पराक्रमी मानते हैं तो रूस-यूक्रेन युद्ध क्यों नहीं रुकवा देते? जिन महिलाओं ने जौहर किया था, उनके सामने कैसी परिस्थितियां थीं? इस बात को समझे बिना कोई टिप्पणी करेंगे तो उसमें गलती होने की पूरी आशंका होगी। जौहर कोई रोजाना होने वाली घटना नहीं थी। जब राजा और सैनिक युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो जाते थे, तब वीर नारियां और क्षत्राणियां जौहर करती थीं, ताकि वे दुश्मन के हाथ न लगें। यह भी ध्यान रखें कि हर युद्ध के बाद ऐसा नहीं होता था। देश में राजाओं के बीच कई युद्ध हुए थे, जिनमें एक पक्ष जीतता और दूसरा हारता था। फिर भी पराजित पक्ष की महिलाएं जौहर नहीं करती थीं, क्योंकि विजेता पक्ष उस स्थिति में कुछ मान-मर्यादाओं का ध्यान जरूर रखता था। जब क्रूर विदेशी आक्रांता आए, जो युद्ध के किसी स्थापित नियम का पालन नहीं करते थे, जो झूठ, धोखा और सामूहिक दुष्कर्म को रणनीति का हिस्सा मानते थे, तब वीर नारियों द्वारा जौहर किए गए थे। उन्हें उस समय यही फैसला अपने लिए सही लगा था।
वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर उन घटनाओं को नहीं देखा जा सकता है। आज दुष्कर्म जैसे मामलों में किसी महिला को न्याय दिलाने के लिए न्यायालय हैं। मीडिया, महिला आयोग और कई संगठन हैं, जो उसके लिए आवाज उठा सकते हैं। ऐसे कई अपराधियों को लंबी कैद मिली है। वे मृत्युदंड तक भुगत चुके हैं। सवाल है- जिन नारियों ने जौहर किया था, अगर वे ऐसा न करतीं तो क्या करतीं? क्या वे उन्हीं दरिंदों और लुटेरों से न्याय मांगने जातीं, जिन्होंने उनके पतियों और भाइयों की हत्याएं की थीं? उन विदेशी आक्रांताओं की मानसिकता को जरूर समझना चाहिए। वे हिंदुओं से बहुत घृणा करते थे। वे भिन्न आस्था रखने वाले सभी समुदायों की नारियों पर कुदृष्टि रखते थे। जब युद्ध में कोई नारी उनके हाथ लगती तो वे उस पर अपना पूरा अधिकार समझते थे। वे उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म करते थे। उसके बाद या तो उसे अपनी गुलाम बनाकर रखते या अपने किसी अन्य साथी को तोहफे में दे देते या बाजार में बेच देते थे। अगर पराजित पक्ष की कोई नारी मृत पाई जाती तो वे उसके शव के साथ भी दुष्कर्म करते थे। आईएसआईएस के आतंकवादियों की ऐसी घिनौनी हरकतें दुनिया में चर्चित रही हैं, जबकि यह तो 'कल' की बात है। सोचिए, पांच सौ साल, हजार साल पहले उन आक्रांताओं की सोच कैसी रही होगी? उनके सामने तो बर्बरता और चरित्रहीनता की कोई सीमा ही नहीं थी। वे जहां जीत हासिल करते, वहां तबाही मचा देते थे। वे छोटी बच्चियों पर भी कोई दया नहीं दिखाते थे। इस सोच के निशान आज भी पाकिस्तान में पाए जाते हैं, जहां कई लोग बंद कब्रों को खोदकर महिलाओं के शव बाहर निकालते हैं और उनसे दुष्कर्म करते हैं। क्षत्रिय समाज ने सदियों पहले ऐसी सोच रखने वाले बर्बर विदेशी आक्रांताओं का दृढ़ता से सामना किया था। उसने देश और धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दिया था। इतिहास को आज की सुविधाजनक दृष्टि से नहीं, बल्कि उस दौर की परिस्थितियों को समझकर ही देखना चाहिए।
वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर उन घटनाओं को नहीं देखा जा सकता है। आज दुष्कर्म जैसे मामलों में किसी महिला को न्याय दिलाने के लिए न्यायालय हैं। मीडिया, महिला आयोग और कई संगठन हैं, जो उसके लिए आवाज उठा सकते हैं। ऐसे कई अपराधियों को लंबी कैद मिली है। वे मृत्युदंड तक भुगत चुके हैं। सवाल है- जिन नारियों ने जौहर किया था, अगर वे ऐसा न करतीं तो क्या करतीं? क्या वे उन्हीं दरिंदों और लुटेरों से न्याय मांगने जातीं, जिन्होंने उनके पतियों और भाइयों की हत्याएं की थीं? उन विदेशी आक्रांताओं की मानसिकता को जरूर समझना चाहिए। वे हिंदुओं से बहुत घृणा करते थे। वे भिन्न आस्था रखने वाले सभी समुदायों की नारियों पर कुदृष्टि रखते थे। जब युद्ध में कोई नारी उनके हाथ लगती तो वे उस पर अपना पूरा अधिकार समझते थे। वे उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म करते थे। उसके बाद या तो उसे अपनी गुलाम बनाकर रखते या अपने किसी अन्य साथी को तोहफे में दे देते या बाजार में बेच देते थे। अगर पराजित पक्ष की कोई नारी मृत पाई जाती तो वे उसके शव के साथ भी दुष्कर्म करते थे। आईएसआईएस के आतंकवादियों की ऐसी घिनौनी हरकतें दुनिया में चर्चित रही हैं, जबकि यह तो 'कल' की बात है। सोचिए, पांच सौ साल, हजार साल पहले उन आक्रांताओं की सोच कैसी रही होगी? उनके सामने तो बर्बरता और चरित्रहीनता की कोई सीमा ही नहीं थी। वे जहां जीत हासिल करते, वहां तबाही मचा देते थे। वे छोटी बच्चियों पर भी कोई दया नहीं दिखाते थे। इस सोच के निशान आज भी पाकिस्तान में पाए जाते हैं, जहां कई लोग बंद कब्रों को खोदकर महिलाओं के शव बाहर निकालते हैं और उनसे दुष्कर्म करते हैं। क्षत्रिय समाज ने सदियों पहले ऐसी सोच रखने वाले बर्बर विदेशी आक्रांताओं का दृढ़ता से सामना किया था। उसने देश और धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दिया था। इतिहास को आज की सुविधाजनक दृष्टि से नहीं, बल्कि उस दौर की परिस्थितियों को समझकर ही देखना चाहिए।
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