इंटरनेट युग के ढोंगी
'पाणी पीओ छाण, गुरु बणाओ जाण'
दूसरों को प्रवचन देने से पहले उन्हें अपने जीवन में उतारना चाहिए
मथुरा में एक कथित प्रवचनकर्ता बाबा द्वारा कई युवतियों से दुष्कर्म और ब्लैकमेलिंग का मामला सिर्फ एक शख्स के अपराधों की कहानी नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई ढोंगी पकड़े गए हैं, जो साधु का पवित्र वेश धारण कर अनैतिक कर्म कर रहे थे। मथुरा से पकड़े गए शख्स का मामला इसलिए चौंकाता है, क्योंकि आरोपी बहुत मेधावी छात्र रहा है। वह आईआईटी उत्तीर्ण करने के बाद एक कंपनी में उच्च वेतन पर नौकरी कर चुका है। उसे तकनीक की बहुत अच्छी जानकारी है, जिसका इस्तेमाल उसने अपना जाल फैलाने में किया। उसने इंटरनेट के जरिए प्रवचन दिए और अपना साम्राज्य बनाने लगा। उसे इसमें कामयाबी मिलनी शुरू हुई थी कि मामला यौन शोषण के आरोपों तक जा पहुंचा। धर्म तो आत्मज्ञान का मार्ग दिखाता है। जो व्यक्ति सच्ची भक्ति में लीन रहता है, उसका मन सांसारिक प्रलोभनों से दूर हो जाता है। उसे किसी तरह का साम्राज्य खड़ा करने की कामना नहीं होती। वह दुष्कर्म और ब्लैकमेलिंग जैसे घिनौने कृत्यों की कल्पना तक नहीं कर सकता। अगर कोई व्यक्ति ऐसे कुकृत्य करता है तो उसका धर्म से कोई संबंध नहीं है। वह मनुष्य कहलाने के योग्य भी नहीं है। हमारे पूर्वजों ने इसीलिए कहा था- 'पाणी पीओ छाण, गुरु बणाओ जाण' अर्थात् पानी पीना हो तो उसे पहले छानें, ताकि वह स्वच्छ हो जाए और किसी को गुरु बनाना हो तो उसे पहले जानें, परखें। यदि उसमें उचित गुण पाएं तो ही उसे गुरु स्वीकार करें। जो व्यक्ति खुद को सबसे बड़ा ज्ञानी, सर्वशक्तिमान बताए, बड़ी-बड़ी डींगें हांके, हमेशा धन इकट्ठा करने में दिलचस्पी लेता रहे और जिसका चरित्र अच्छा न हो, ऐसे व्यक्ति से तुरंत दूर चले जाने में भलाई है। अन्यथा भविष्य में पछताना पड़ सकता है।
दूसरों को प्रवचन देने से पहले उन्हें अपने जीवन में उतारना चाहिए। इसके लिए अध्ययन, मनन और चिंतन करना पड़ता है। गुरु के मार्गदर्शन में तपस्या करनी होती है। हमारे देश में रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद जैसे महान संत हुए हैं। उन्होंने तपस्या का मार्ग अपनाया था। उसके बाद वे पूजनीय हुए थे। अब इंटरनेट ने उन लोगों के लिए काफी आसानी पैदा कर दी है, जो भक्ति और तपस्या करना नहीं चाहते। वे कैमरे के सामने स्क्रिप्ट बांच लेते हैं। एआई की मदद से अच्छा वीडियो तैयार कर लेते हैं। फिर उसके जरिए अपना माहौल बनाने निकल पड़ते हैं। चूंकि उनके मन में न तो असली वैराग्य होता है, न उन्हें भक्ति की समझ होती है और न ही विषय-वासनाओं से कोई विरक्ति होती है, इसलिए जब थोड़ी-सी कामयाबी मिल जाती है तो सारी हदें पार कर देते हैं। वे जितनी तेजी से उभरते हैं, उतनी ही तेजी से पतन को प्राप्त होते हैं। उनके अनुयायियों को तब बड़ा झटका लगता है, जब कच्चा चिट्ठा खुलकर सामने आता है। जब किसी ढोंगी का नकली आभामंडल टूट जाता है, तब कुछ लोगों को धर्म पर सवाल उठाने का मौका मिल जाता है। वे सभी साधु-संतों को एक जैसा मानकर टीका-टिप्पणी करने लगते हैं। यह अनुचित है। सभी लोग एक जैसे नहीं हो सकते। किसी एक व्यक्ति के कृत्यों के आधार पर सबको उसी श्रेणी में खड़ा कर देना उन सबके साथ अन्याय है। आज भी देश में ऐसे संत हैं, जो बहुत अनुशासित रहकर जनकल्याण कर रहे हैं। वे मान-अपमान से कोसों दूर रहते हैं। उन्हें धन-संपदा का ढेर डिगा नहीं सकता। वे खुद को भक्तिमार्ग का एक पथिक ही समझते हैं। करोड़ों लोग ऐसे संतों से प्रेरणा लेते हैं। उनका यश अमर रहता है।

