मोदी की टॉफी से इनका मुंह कड़वा क्यों?

क्या गरीबी कोई उपलब्धि है, जिस पर हमें गर्व करना चाहिए?

मोदी की टॉफी से इनका मुंह कड़वा क्यों?

नेताओं को लोगों का जीवन स्तर बेहतर बनाने के लिए काम करना चाहिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इटली की अपनी समकक्ष जॉर्जिया मेलोनी को टॉफी का एक पैकेट क्या भेंट कर दिया, भारत में कुछ लोगों के मुंह में कड़वाहट घुल गई। यह कड़वाहट उनके शब्दों के जरिए बाहर निकल रही है। उनकी शिकायत है कि 'प्रधानमंत्री ने टॉफी के उस ब्रांड का प्रचार क्यों कर दिया, क्योंकि उनका काम किसी कंपनी को बढ़ावा देना नहीं है?' एक तरफ यह शिकायत की जाती है कि केंद्र सरकार भारतीय उद्योग-धंधों की फिक्र नहीं करती; जब प्रधानमंत्री सद्भावना के तहत किसी भारतीय ब्रांड को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पेश करते हैं तो यहां कुछ लोग हंगामा करने लगते हैं! ऐसा लगता है कि उन्होंने हर परिस्थिति में शिकायत करने और असंतुष्ट रहने की कोई गुप्त प्रतिज्ञा कर रखी है। भारत में दुर्भाग्य से एक ऐसी विचारधारा गहराई तक जड़ जमा चुकी है, जो हमेशा उद्योग-धंधों का विरोध करने में ही बड़प्पन महसूस करती है। वह बेरोजगारी का मुद्दा तो उठाती है, लेकिन इसका निवारण कैसे हो, इसके लिए उसके पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। अगर कोई व्यक्ति अपनी पूंजी, परिश्रम और प्रतिभा से उद्योग लगाता है तो उसकी नजरों में वह सबसे बड़ा शोषक होता है। उसे कोसना, आड़े हाथों लेना, हर समस्या के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहरा देना ... ये उस विचारधारा के मूल तत्त्व हैं। जब ऐसी सोच हावी रहेगी तो रोजगार के अवसर कैसे पैदा होंगे? क्या गरीबी कोई उपलब्धि है, जिस पर हमें गर्व करना चाहिए? गरीबी अपने साथ कई समस्याएं लाती है। नेताओं को इसमें वोटबैंक ढूंढ़ने के बजाय लोगों का जीवन स्तर बेहतर बनाने के लिए काम करना चाहिए।

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प्रधानमंत्री के कई कार्यों में से एक कार्य यह भी है कि वे देश के उद्योग-धंधों को बढ़ावा दें। इसके अनेक तरीके हो सकते हैं। जब प्रधानमंत्री खादी के वस्त्र पहनकर लोगों से खादी खरीदने की अपील करते हैं तो इसका फायदा लाखों परिवारों को मिलता है। जब प्रधानमंत्री लक्षद्वीप में समुद्र तट पर कुछ कदम चलते हैं तो वहां पर्यटन की नई लहर पैदा हो जाती है। जब प्रधानमंत्री केदारनाथ धाम जाकर एक गुफा में ध्यान लगाते हैं तो आध्यात्मिक चिंतन से जुड़ी नई व्यवस्था आकार ले लेती है। कुछ लोग इसे समय की बर्बादी, दिखावेबाजी और पब्लिसिटी स्टंट कहकर अपनी भड़ास निकाल सकते हैं, लेकिन यह न भूलें कि इन गतिविधियों के केंद्र में देश का आम नागरिक है। अगर प्रधानमंत्री से प्रेरित होकर एक लाख लोग भी किसी चीज को खरीदेंगे तो उस धन से हजारों परिवारों को सहारा मिलेगा। प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान एक दुकान से झालमुड़ी खाई थी। उसके बाद कुछ लोग सोशल मीडिया पर यह कहते नजर आए थे, 'प्रधानमंत्री का यह काम होता है क्या? उन्हें लोगों को रोजगार देने के लिए काम करना चाहिए?' उस दिन से लेकर आज तक झालमुड़ी खूब चर्चा में है। लोग झालमुड़ी खा रहे हैं, खिला रहे हैं। विदेशी पर्यटक भी इसका स्वाद चख रहे हैं। क्या इससे झालमुड़ी बेचने वाले हजारों लोगों की कमाई नहीं बढ़ी? प्रधानमंत्री भारत के खानपान को पहचान दिला रहे हैं। क्या यह आनंद का विषय नहीं है? पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की कोशिशों से देश में एक कंपनी शुरू हुई थी, जिसकी घड़ियां बहुत मशहूर थीं। बाद में सरकारों ने उसकी ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया और वह भारी घाटे में चली गई। उसका संचालन अवरुद्ध हुआ और वह वापसी नहीं कर पाई। अगर पिछली सरकारों के प्रधानमंत्री और सभी मंत्री उस कंपनी की घड़ियों का प्रचार करते तो आज वह अंतरराष्ट्रीय ब्रांड होती। उससे देश को हर साल अरबों डॉलर मिलते। स्वदेशी उत्पाद हमारी अर्थव्यवस्था के प्राण होते हैं। उनकी स्थिति मजबूत बनाएं। स्वदेशी से ही देश की उन्नति होगी। इसमें राजनीतिक मतभेदों को बाधा न बनने दें।

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