यह आग नहीं, अमृत बरस रहा है
दुनिया इसके लिए डॉलर वसूलती है
ईश्वर हमें यह मुफ्त में दे रहे हैं
आजकल अख़बारों, टीवी, यूट्यूब चैनलों, फ़ेसबुक, एक्स ... सब जगह एक ही ख़बर चल रही है- 'आसमान से बरस रही आग ... भारत में पड़ रही भयंकर गर्मी ... हर कोई परेशान ... दूर-दूर तक राहत के आसार नहीं।' कुछ दिन बाद जब मानसून आ जाएगा तो सब जगह यह ख़बर दिखाई देगी- 'नदी-नाले उफान पर ... सड़कें बनीं दरिया ... सड़कों पर सैलाब।' ऐसा हर साल पढ़ने-सुनने को मिलता है। कल जो विपक्ष में थे, वे यह स्थिति देखकर शिकायत करते थे। आज जो विपक्ष में हैं, वे शिकायत करते हैं। भविष्य में जो विपक्ष में होंगे, वे भी शिकायत करेंगे। समस्या सब जानते हैं। समाधान की बात उस स्तर पर नहीं हो रही है। ऐसा लगता है कि अब हम कृषि प्रधान समाज नहीं रहे, बल्कि शिकायत प्रधान समाज बन गए हैं। हर कहीं शिकायतों का शोर है। समाधान की चर्चा कम ही सुनाई दे रही है। अगर अभी आसमान से आग बरस रही है तो इसका सही-सही उपयोग करें, ताकि यह ईंधन की जगह काम आए। आग अपनेआप में बहुत बड़ी शक्ति होती है। दुनिया इसके लिए डॉलर वसूलती है। ईश्वर हमें यह मुफ्त में दे रहे हैं। अगर हम अपना नज़रिया थोड़ा-सा बदलें, कुछ सावधानी भी रखें तो पाएंगे कि आसमान से आग नहीं बरस रही, बल्कि अमृत बरस रहा है। हमने अपने अंदर वह शक्ति और सामर्थ्य पैदा नहीं की, जिससे इसका पर्याप्त मात्रा में सदुपयोग कर सकें। जब वर्ष 1767 में जिनेवा के वैज्ञानिक होरेस-बेनेडिक्ट डी सॉसर ने एक 'हॉट बॉक्स' या शुरुआती 'सोलर ओवन' बनाकर उसके सिद्धांतों का वर्णन किया था तो कई लोगों को विश्वास ही नहीं हुआ कि सूरज की रोशनी से खाना पकाया जा सकता है। इसके लगभग सौ साल बाद फ्रेंच फॉरेन लीजन (फ्रेंच सेना की एक विशिष्ट शाखा) ने सूरज की रोशनी से खाना पकाने के सिद्धांत को काफी हद तक विकसित कर लिया था। हालांकि तब भी यह एक उपेक्षित आविष्कार था, जो आज तक है।
यूरोप में संभवत: ठंड की अधिकता के कारण इस आविष्कार को बहुत बढ़ावा नहीं मिला, लेकिन भारत में ऐसी कोई समस्या नहीं है। यहां खूब धूप पड़ती है। ज्यादातर इलाके प्रकृति के इस वरदान से मालामाल रहते हैं। अगर भारत में शिकायतों के बजाय सोलर कुकर या सोलर ओवन के उपयोग पर ध्यान केंद्रित किया जाता तो आज कहीं ईंधन की कोई समस्या नहीं होती। इसमें भारी पुर्जे नहीं लगते। तेल, गैस और लकड़ी का कोई झंझट नहीं है। भारत में एक औसत परिवार साल में लगभग छह से नौ एलपीजी सिलेंडर काम में लेता है। अगर वह नियमित रूप से सोलर कुकर का उपयोग करे, खासकर चावल, दाल, आलू और अन्य सब्जियां इसमें उबाले, पानी-दूध गर्म करे, तो लगभग 30 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक एलपीजी की बचत हो सकती है। राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे राज्य जहां साल में 250 से 300 दिन अच्छी धूप होती है, वहां सोलर कुकर का अनुशासित उपयोग इससे भी ज्यादा एलपीजी की बचत करवा सकता है। अगर समस्त देशवासी दृढ़ निश्चय कर लें तो हम सालाना करोड़ों सिलेंडर बचा सकते हैं! इससे विदेशी मुद्रा भंडार के अरबों डॉलर की बचत हो सकती है। सिर्फ दर्पण, धूप, वैज्ञानिक सोच और दृढ़ निश्चय के दम पर हम भारतवासी दुनिया के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं। ध्यान रखें, सोलर कुकर एलपीजी सिलेंडर का पूर्णत: स्थान नहीं ले सकता, लेकिन इसका अनुशासित उपयोग ईंधन की अच्छी-खासी बचत करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है। सरकार को चाहिए कि वह सोलर कुकर के बेहतर संस्करण तैयार करने के लिए वैज्ञानिकों को प्रोत्साहन दे। इस क्षेत्र में अपार संभावना है। सोलर कुकर, एलपीजी और इलेक्ट्रिक कुकिंग के संयुक्त (हाइब्रिड) उपयोग से भविष्य में खाना पकाने का तरीका ज्यादा किफायती, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बन सकता है।

